शिमला।राजवीर दीक्षित
हिमाचल प्रदेश में बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। अब जंगलों से होकर गुजरने वाली नदियों में वैज्ञानिक तरीके से ड्रेजिंग यानी गाद, मलबा, पत्थर और बड़े बोल्डर हटाने का काम किया जा सकेगा। केंद्र ने ऐसी गतिविधियों को वन संरक्षण कानून के तहत गैर-वन गतिविधि नहीं मानने की छूट दी है। हालांकि, इसके लिए सख्त पर्यावरणीय शर्तों और निगरानी व्यवस्था का पालन करना होगा।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इस संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यह फैसला हिमाचल प्रदेश सरकार की मांग के बाद आया है। प्रदेश सरकार ने भारी बारिश, बादल फटने और अचानक आने वाली बाढ़ के कारण नदियों में जमा हुए मलबे को हटाने के लिए केंद्र से हस्तक्षेप की मांग की थी।
सरकार के अनुसार, नदियों में गाद और मलबा जमा होने से उनकी पानी ले जाने की क्षमता प्रभावित होती है। इससे आसपास की बस्तियों, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे पर बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
नई व्यवस्था का उद्देश्य नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बहाल करना, नदी और वन पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा करना, तटों को स्थिर बनाना और बाढ़ के जोखिम को कम करना है।
वन संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम, 1980 के तहत जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, राज्य वन विभाग या उसके नियंत्रण वाली एजेंसी को ड्रेजिंग के लिए विस्तृत योजना तैयार करनी होगी। यह योजना किसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थान के वैज्ञानिक आकलन पर आधारित होगी।
योजना में नदी के उस हिस्से का विवरण देना होगा, जहां से मलबा हटाया जाएगा। इसके अलावा मलबे की मात्रा, प्रकृति, इस्तेमाल होने वाली मशीनरी, कार्य की अवधि, पर्यावरण सुरक्षा के उपाय और हटाई गई सामग्री के निपटारे की व्यवस्था भी स्पष्ट करनी होगी।
केंद्र ने स्पष्ट किया है कि यह छूट केवल प्राकृतिक आपदाओं के कारण जमा हुए मलबे को हटाने के लिए होगी। इसमें बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने और भूकंप जैसी घटनाओं से प्रभावित वन क्षेत्रों को शामिल किया गया है। यह व्यवस्था संरक्षित क्षेत्रों से बाहर लागू होगी।
खनिजों या नदी तल की सामग्री का व्यावसायिक दोहन करने के उद्देश्य से की जाने वाली गतिविधियों को इस छूट में शामिल नहीं किया गया है।
राज्य सरकारों को हटाई गई सामग्री की मात्रा, उसके परिवहन, निपटारे और उपयोग से होने वाली आय की निगरानी के लिए व्यवस्था बनानी होगी। यदि राज्य ड्रेजिंग से निकली सामग्री के निपटारे पर रॉयल्टी वसूलता है, तो वन संरक्षण कानून और अन्य संबंधित कानूनों के तहत आवश्यक मंजूरी लेनी होगी।
निर्धारित समय सीमा या स्वीकृत योजना से बाहर जाकर ड्रेजिंग करने पर इसे व्यावसायिक खनन माना जाएगा। ऐसी स्थिति में काम रोकने के साथ कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।
केंद्र के इस फैसले से हिमाचल में बाढ़ प्रभावित नदी क्षेत्रों की सफाई और प्राकृतिक जल प्रवाह बहाल करने के प्रयासों को गति मिलने की उम्मीद है।


















