टारगेट न्यूज़ ग्राउंड रिपोर्ट: पंजाब के मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में दाखिला प्रक्रिया के दौरान एक बार फिर से सीटों के खाली रहने का गंभीर मामला सामने आया है। राज्य के विभिन्न चिकित्सा संस्थानों में एमबीबीएस (MBBS) और बीडीएस (BDS) की कुल सीटों का खाली रहना शिक्षा और स्वास्थ्य ढांचे पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। हाल ही में अखिल भारतीय कोटा (AIQ) के तहत अन्य राज्यों के मेडिकल कॉलेजों में पंजाब के छात्रों के शिफ्ट होने के बाद, राज्य के भीतर खाली सीटों की संख्या में और इजाफा दर्ज किया गया है। फरीदकोट स्थित बाबा फरीद स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (BFUHS) द्वारा काउंसलिंग के तीसरे दौर के लिए जारी की गई आधिकारिक सीट मैट्रिक्स के अनुसार, अब राज्य भर के मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में कुल 834 सीटें खाली पड़ी हैं। इससे पहले यह आंकड़ा 808 था, जो कि अब बढ़कर सीधे 834 तक पहुंच गया है। इस स्थिति ने न केवल प्रशासनिक अमले की चिंता बढ़ा दी है, बल्कि अभिभावकों और छात्रों के बीच भी असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है।
ग्राउंड से मुख्य जानकारी (Key Takeaways)
- पंजाब के मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में कुल खाली सीटों का आंकड़ा बढ़कर अब 834 पर पहुंच गया है।
- कुल रिक्त सीटों में 322 एमबीबीएस और 512 बीडीएस की सीटें शामिल हैं।
- एनआरआई (NRI) कोटे में सबसे अधिक 389 सीटें खाली हैं, जो कुल रिक्त सीटों का लगभग 47 प्रतिशत है।
- गुरु गोबिंद सिंह मेडिकल कॉलेज, फरीदकोट में सबसे अधिक 53 सीटें खाली हैं।
- अखिल भारतीय कोटे में छात्रों के अन्य राज्यों में जाने से यह स्थिति और अधिक विकट हुई है।
घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्योरा (Chronological Event Breakdown)
काउंसलिंग के पहले और दूसरे दौर के संपन्न होने के बाद, जब तीसरे और अंतिम चरण की प्रक्रिया शुरू हुई, तो छात्रों ने अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर बेहतर विकल्पों का चयन करना शुरू किया। इस प्रक्रिया के तहत, पंजाब के कई मेधावी छात्रों ने अखिल भारतीय कोटे के अंतर्गत देश के अन्य प्रतिष्ठित राज्यों के मेडिकल संस्थानों में दाखिला लेना बेहतर समझा। परिणाम यह हुआ कि राज्य के कोटे की सीटें पीछे छूट गईं और अचानक से रिक्त सीटों की संख्या में 26 की और बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे कुल खाली सीटों का आंकड़ा 834 पर जा पहुंचा। बाबा फरीद स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, इन खाली सीटों में 322 सीटें एमबीबीएस की हैं जबकि 512 सीटें बीडीएस कोर्स से संबंधित हैं।
श्रेणीवार विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि एनआरआई कोटे में सबसे भारी तादाद में सीटें खाली बची हैं। अकेले एनआरआई कोटे में 175 एमबीबीएस और 214 बीडीएस यानी कुल 389 सीटें खाली हैं, जो कुल रिक्त सीटों का लगभग 47 फीसदी हिस्सा कवर करती हैं। इसके अलावा, अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के लिए आरक्षित सीटों की बात करें तो बीडीएस में 119 और एमबीबीएस में मात्र 14 सीटें खाली हैं। ओपन कैटेगरी में एमबीबीएस की 30 और बीडीएस की 12 सीटें रिक्त हैं। दिव्यांगजन (PwD) श्रेणी के अंतर्गत 59 एमबीबीएस और 70 बीडीएस सीटें अभी भी किसी के द्वारा नहीं भरी जा सकी हैं।
संस्थानवार अगर बात की जाए, तो सरकारी और निजी दोनों तरह के कॉलेज इससे प्रभावित हुए हैं। गुरु गोबिंद सिंह मेडिकल कॉलेज, फरीदकोट में सबसे ज्यादा 53 सीटें खाली हैं, जिनमें से 38 अकेली एनआरआई कोटे की हैं। बठिंडा स्थित आदेश इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च में 47, अमृतसर के श्री गुरु राम दास इंस्टीट्यूट में 43, जालंधर के पंजाब इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में 35, बानूर के ग्यान सागर मेडिकल कॉलेज में 32 और मंडी गोबिंदगढ़ के आरआईएमटी मेडिकल कॉलेज में 30 सीटें खाली पड़ी हैं। इसके विपरीत, लुधियाना स्थित ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज में एक भी सीट खाली नहीं है, जो कि पूरी तरह भरी हुई है। डेंटल कॉलेजों का हाल भी कुछ ऐसा ही है, जहां आरआईएमटी डेंटल कॉलेज और डेरा बस्सी स्थित श्री सुखमणि डेंटल कॉलेज में 46-46 सीटें खाली हैं।
प्रशासनिक व स्थानीय प्रतिक्रिया (Official Action & Public Reaction)
इस पूरे घटनाक्रम पर शिक्षाविदों, अभिभावक संघों और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े जानकारों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। जानकारों का मानना है कि अत्यधिक फीस ढांचे, विशेषकर एनआरआई कोटे और निजी प्रबंधन कोटे की भारी-भरकम फीस के कारण योग्य छात्र इन सीटों से दूरी बना रहे हैं। इसके अलावा, राज्य सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन पर यह दबाव बढ़ रहा है कि वे काउंसलिंग प्रक्रिया में सुधार लाएं ताकि इतनी बड़ी संख्या में बहुमूल्य सीटें यूं बर्बाद न हों। स्थानीय लोगों और छात्र संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते इन खाली सीटों को भरने के लिए नियमों में कुछ ढील या फीस समायोजन नहीं किया गया, तो राज्य के चिकित्सा शिक्षा संसाधनों का भारी नुकसान होगा।
स्थानीय शिक्षा विशेषज्ञों और अभिभावकों का कहना है कि उच्च शिक्षा की बढ़ती लागत और प्रशासनिक नियमों की जटिलता के कारण आज छात्र पंजाब के निजी और महंगे मेडिकल कॉलेजों के बजाय अन्य राज्यों के विकल्पों को प्राथमिकता देने पर मजबूर हो रहे हैं, जिससे राज्य का कोटा खाली रह जाता है।
आगे क्या? (What Lies Ahead)
आगामी दिनों में बाबा फरीद स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय और चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती इन 834 खाली सीटों को मॉप-अप राउंड या स्पेशल वैकेंसी राउंड के जरिए भरने की होगी। यदि इन सीटों को जल्द से जल्द पारदर्शी और व्यावहारिक तरीकों से नहीं भरा गया, तो मेडिकल और डेंटल कॉलेजों को शैक्षणिक सत्र के संचालन में वित्तीय और प्रशासनिक दोनों मोर्चों पर भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। प्रशासन अब इन सीटों को भरने के लिए आगे की रणनीतिक काउंसलिंग आयोजित करने पर विचार कर रहा है, ताकि राज्य के भीतर चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और उपलब्धता दोनों को संतुलित रखा जा सके।

















