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मंदिरों के पुजारियों और सेवादारों के मानदेय पर होगी सुनवाई, सरकारी व्यवस्थाओं पर उठे सवाल

चंडीगढ़। राजवीर दीक्षित

(“Hearing to be held on honorarium of temple priests and volunteers; questions raised over government arrangements “) देशभर के सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारियों और सेवादारों को मिलने वाले मानदेय को लेकर अब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। Supreme Court of India में दायर एक जनहित याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों से मांग की गई है कि मंदिरों में काम कर रहे पुजारियों, सेवादारों और अन्य कर्मचारियों की तनख्वाह तथा सुविधाओं की समीक्षा के लिए न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति बनाई जाए। यह याचिका एडवोकेट Ashwini Upadhyay द्वारा दाखिल की गई है।

याचिका में कहा गया है कि जब सरकार मंदिरों के प्रशासनिक और वित्तीय नियंत्रण को अपने हाथ में लेती है, तो सरकार और कर्मचारियों के बीच नियोक्ता-कर्मचारी संबंध बन जाता है। ऐसे में मंदिर कर्मचारियों को सम्मानजनक वेतन और न्यूनतम मजदूरी से वंचित रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जीवन और आजीविका के अधिकार का उल्लंघन माना जाना चाहिए।

पिटीशन में दावा किया गया कि कई सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारियों और कर्मचारियों को इतनी कम तनख्वाह दी जा रही है कि वे सम्मानजनक जीवन भी नहीं जी पा रहे हैं। याचिकाकर्ता ने बताया कि 4 अप्रैल को वाराणसी स्थित Kashi Vishwanath Temple में ‘रुद्राभिषेक’ करने के दौरान उन्हें इस स्थिति की जानकारी मिली। वहां काम कर रहे कई पुजारियों और कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी तक नहीं मिल रही थी।

अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने की संभावना है, जिससे देशभर के लाखों मंदिर कर्मचारियों को राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। यह मुद्दा सोशल मीडिया पर भी तेजी से चर्चा में है, जहां लोग धार्मिक संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों के अधिकारों और उनके आर्थिक हालात को लेकर सवाल उठा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मामले में कोई बड़ा फैसला आता है तो देशभर के मंदिर प्रशासन में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

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