टारगेट न्यूज़ विशेष कवरेज: हिमाचल प्रदेश के खूबसूरत पर्यटन स्थल कसौली में वीकेंड मनाने गई चार महिलाओं को बीच सफर से सामान सहित बाहर निकाले जाने के मामले में चंडीगढ़ राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने प्रसिद्ध ऑनलाइन बुकिंग प्लेटफॉर्म मेकमायट्रिप (MakeMyTrip) को आदेश दिया है कि वह सभी चारों महिला complainants को मानसिक उत्पीड़न और प्रताड़ना के लिए कुल 1,20,000 रुपये का मुआवजा (प्रत्येक को 30,000 रुपये) और मुकदमे के खर्चे के रूप में 20,000 रुपये का भुगतान करे। यह फैसला जिला उपभोक्ता आयोग के उस पुराने आदेश को संशोधित करते हुए आया है, जिसमें बेहद कम मुआवजा तय किया गया था और महिलाओं ने इसके खिलाफ अपील की थी। इस पूरे घटनाक्रम ने ऑनलाइन ट्रैवल एजेंसियों (OTAs) की जवाबदेही और उनकी सेवाओं की विश्वसनीयता पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहां छुट्टियां मनाने निकले पर्यटकों को इस तरह की भारी मानसिक और शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
प्रमुख आकर्षण और बिंदु (Highlights)
- चंडीगढ़ राज्य उपभोक्ता आयोग ने मेकमायट्रिप पर कुल 1,40,000 रुपये (मुआवजा और मुकदमे का खर्च मिलाकर) का वित्तीय दंड लगाया है।
- यह मामला 4 और 5 मई 2024 का है, जब चार महिलाओं ने कसौली के फेयरहोल्म मेनेज विला में बुकिंग कराई थी।
- विला में चेक-इन करने और दोपहर का भोजन करने के घंटों बाद, शाम को विला के मालिक और स्टाफ ने उन्हें बुकिंग रद्द होने का हवाला देकर जबरन बाहर निकाल दिया था।
- महिलाओं को शाम करीब 7:15 बजे मजबूरन विला छोड़ना पड़ा और रात को असुरक्षित परिस्थितियों में टैक्सी से वापस चंडीगढ़ लौटना पड़ा।
- राज्य आयोग ने माना कि महिलाओं की यह मानसिक पीड़ा केवल वित्तीय नहीं थी, बल्कि उनकी शांति और विश्राम की यात्रा को जबरन तनाव में बदला गया था।
पूरे घटनाक्रम की कहानी (Full Story)
इस पूरे मामले की शुरुआत मई 2024 के पहले सप्ताह में हुई थी। चंडीगढ़ की रहने वाली चार महिलाओं—गायत्री सूरी, उर्वशी शर्मा, नवजोत ढिल्लों और सुरभि मरकंडा ने अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ पल निकालकर मानसिक शांति और रीजुवेनेशन के लिए कसौली जाने का प्लान बनाया था। उन्होंने देश की एक प्रतिष्ठित ट्रैवल बुकिंग कंपनी मेकमायट्रिप के माध्यम से कसौली स्थित एक लग्जरी 3 बीएचके विला ‘फेयरहोल्म मेनेज’ में एक रात (4 मई से 5 मई 2024) के लिए बुकिंग कराई थी। कंपनी द्वारा उन्हें बुकिंग की पुष्टि ईमेल और टेक्स्ट मैसेज के जरिए दी जा चुकी थी, जिसके एवज में उन्होंने 26 अप्रैल 2024 को ही 21,000 रुपये का भुगतान ऑनलाइन कर दिया था।
तय कार्यक्रम के अनुसार, 4 मई को चारों महिलाएं टैक्सी का 4,000 रुपये किराया चुकाकर कसौली के लिए रवाना हुईं। विला पहुंचने पर जब उन्होंने केयरटेकर और कुक से संपर्क किया, तो उन्होंने बताया कि विला पूरी तरह तैयार है और उनके लिए दोपहर का भोजन भी बन चुका है। दोपहर करीब 2 बजे महिलाओं ने विला में आसानी से चेक-इन किया, उनका सामान कमरों में रखवाया गया और वे अपने कमरे में आराम से व्यवस्थित हो गईं। सब कुछ योजना के अनुसार चल रहा था और वे अपनी छुट्टियों का आनंद लेने की तैयारी में थीं।
लेकिन शाम करीब 5:15 बजे अचानक दो स्टाफ सदस्य उनके पास आए और बताया कि बुकिंग में कोई तकनीकी समस्या है तथा विला के मालिक उनसे बात करना चाहते हैं। फोन पर विला के मालिक ने उन्हें चौंकाने वाली बात बताई। मालिक का कहना था कि यह बुकिंग तीन दिन पहले ही रद्द कर दी गई थी और वे अब वहां और नहीं रुक सकतीं। महिलाओं ने तुरंत स्पष्ट किया कि उनकी बुकिंग पूरी तरह कन्फर्म थी और उन्होंने अपनी तरफ से कोई रद्दीकरण नहीं किया था। इसके बावजूद, उनकी एक नहीं सुनी गई और उन्हें शाम करीब 7:15 बजे विला खाली करने के लिए मजबूर कर दिया गया। उस समय अंधेरा होने को था, उनके पास कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं था और परिवहन के साधन भी सीमित थे। मजबूरन उन्हें दोबारा टैक्सी बुक करके 8,000 रुपये चुकाकर रात करीब 9 बजे वापस चंडीगढ़ लौटना पड़ा।
मुख्य सवाल और उनके जवाब (Key Questions & Answers)
सवाल 1: क्या मेकमायट्रिप ने इस मामले में अपनी गलती स्वीकार की?
जवाब: कंपनी के वकील ने सुनवाई के दौरान सभी आरोपों से इनकार किया और अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश की, लेकिन आयोग ने दस्तावेजों और सबूतों के आधार पर पाया कि सेवा में भारी कमी (Deficiency in Service) हुई है।
सवाल 2: जिला आयोग और राज्य आयोग के फैसले में क्या अंतर था?
जवाब: जिला उपभोक्ता आयोग ने मेकमायट्रिप को मात्र 15,000 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। इससे असंतुष्ट होकर महिलाओं ने राज्य आयोग में अपील दायर की, जहां मुआवजे की राशि को बढ़ाकर प्रति महिला 30,000 रुपये (कुल 1.20 लाख रुपये) कर दिया गया।
राज्य आयोग ने अपने फैसले में स्पष्ट टिप्पणी की कि कसौली जैसी खूबसूरत वादियों में विश्राम के लिए जाने वाली महिलाओं को जिस तरह अचानक बीच शाम को सड़क पर आने के लिए मजबूर किया गया, वह अत्यंत पीड़ादायक, अपमानजनक और सेवा में गंभीर लापरवाही का स्पष्ट उदाहरण है।
समापन और निष्कर्ष (Conclusion)
यह फैसला उन तमाम यात्रियों और पर्यटकों के लिए एक बड़ी राहत और कानूनी नजीर है जो ऑनलाइन ट्रैवल पोर्टल्स की झूठी गारंटियों और बुकिंग्स पर भरोसा करते हैं। कसौली के इस मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम यात्रियों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए पूरी तरह सक्षम है। ट्रैवल कंपनियों को अब अपनी सेवाएं और थर्ड-पार्टी होटल समन्वय प्रणालियों को और अधिक पारदर्शी बनाना होगा, अन्यथा इस तरह के मामलों में उन्हें भारी वित्तीय और व्यावसायिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। महिलाओं को मिला यह न्याय डिजिटल युग में उपभोक्ता जागरूकता की एक बड़ी जीत है।

















