शिमला । राजवीर दीक्षित
(Supreme Court approves withdrawal of several cases against MPs and MLAs in Himachal)कोविड-19 काल में प्रदर्शन और धरनों को लेकर हिमाचल में दर्ज 60 से अधिक मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को सांसदों और विधायकों के खिलाफ चल रहे इन मुकदमों को वापस लेने की अनुमति दे दी। कोर्ट के मुताबिक, मुकदमे जारी रखने का आपराधिक न्याय व्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट की CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने साफ कहा कि इन मामलों में न तो कोई गंभीर अपराध सामने आता है और न ही आरोपियों के आदतन अपराधी होने के संकेत मिलते हैं। कोर्ट के मुताबिक, जन-प्रतिनिधियों पर लगे ज्यादातर आरोप धरनों में भाग लेने और जनता की आवाज अलग-अलग मंचों पर उठाने से जुड़े हैं
बेंच ने कहा कि इस तरह के मुकदमों को जारी रखने से न्याय व्यवस्था को कोई ठोस लाभ नहीं मिलने वाला। न इससे आपराधिक न्याय प्रक्रिया को मजबूती मिलेगी और न ही व्यापक जनहित की पूर्ति होगी। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में समय और संसाधन खर्च करने के बजाय गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अदालतों पर पहले से ही मुकदमों का भारी बोझ है, ऐसे में गैर-जरूरी मामलों को लंबा खींचना न्यायिक संसाधनों के उचित इस्तेमाल पर भी सवाल खड़ा करता है।
अदालत ने कहा कि इन कार्यवाहियों को आगे बढ़ाने से आपराधिक न्याय व्यवस्था को कोई खास लाभ नहीं होगा और न ही इससे जनहित पूरा होगा। इसके बजाय अदालतों का बहुमूल्य समय ऐसे मामलों में खर्च होगा, जिसे गंभीर और लंबे समय से लंबित विवादों के निपटारे में लगाया जा सकता है। कोर्ट ने माना कि न्यायिक संसाधनों का इस्तेमाल उन मामलों में होना चाहिए, जिनमें जल्द फैसला जरूरी है।
हिमाचल प्रदेश सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया गया। सरकार ने हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें कुछ मामलों में मुकदमे वापस लेने की अनुमति केवल सीमित रूप से दी गई थी।
विधायकों पर दर्ज मुकदमों की वापसी को लेकर सरकार के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही महत्वपूर्ण सीमाएं तय कर चुका है। 2021 के अश्विनी उपाध्याय फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि कार्यपालिका की शक्ति का इस्तेमाल न्यायिक जांच से परे नहीं हो सकता। ऐसे में मुकदमे वापस लेने के लिए हाई कोर्ट की मंजूरी जरूरी थी।
इन मामलों में अलग-अलग परिस्थितियों में दर्ज किए गए कई तरह के केस शामिल थे। इनमें IPC की धारा 269 के तहत जानलेवा बीमारी का संक्रमण फैलने का खतरा पैदा करने वाले कथित कृत्य भी थे। सरकारी कर्मचारियों पर कथित हमला या आपराधिक बल के इस्तेमाल के मामले भी सामने आए, हालांकि इनमें किसी वास्तविक चोट की बात नहीं थी।
इसके साथ ही IPC की धारा 504 और 506 के तहत शांति भंग करने और आपराधिक धमकी देने के आरोप भी शामिल थे। कोविड-19 महामारी के दौरान नेशनल हाईवे पर धरना देने या जमावड़ा करने वाले मामलों को भी सूची में जगह मिली। डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट की धारा 51 के तहत दर्ज केस और पुतला जलाने से जुड़े मामले भी इसी दायरे में रखे गए।



















