सोलन । राजवीर दीक्षित
(People falling ill due to industrial pollution! Residents take to the streets in Nalagarh) नालागढ़ में एक बार फिर औद्योगिक प्रदूषण का मुद्दा गरमा गया है। बुधवार को BBN इंडस्ट्रियल क्लस्टर में पानी और हवा के प्रदूषण के खिलाफ पर्यावरण संगठनों और स्थानीय लोगों ने जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि फैक्ट्रियों से निकलने वाला प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इंसानों और पशुओं की सेहत पर भी गंभीर असर डाल रहा है। लोगों ने भूजल स्तर में गिरावट और हवा की लगातार बिगड़ती गुणवत्ता को लेकर चिंता जताई। प्रदर्शन में पंचायती राज संस्थाओं और पर्यावरण संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। उनका कहना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में हालात और गंभीर हो सकते हैं। दरअसल, पंजाब मोर्चा की ओर से इस मुद्दे को NGT और हिमाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सामने प्रमुखता से उठाया गया था। इसके बाद मामला और गंभीरता से चर्चा में आया। NGT ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। साथ ही सोलन के डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता में एक संयुक्त समिति गठित की गई है, जिसे पूरे मामले की जांच कर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
नालागढ़ का औद्योगिक इलाका… जहां हजारों लोगों के लिए रोजगार के अवसर हैं, वहीं अब प्रदूषण को लेकर विरोध की आवाज भी तेज होती नजर आ रही है। अधिकारियों के खिलाफ़ नारेबाजी के बाद प्रदर्शनकारियों ने जनसभा की। यहां वक्ताओं ने इलाके में बढ़ते प्रदूषण और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को उठाया। हिमालय नीति अभियान के कोऑर्डिनेटर गुमान सिंह ने SDM नालागढ़ को सौंपे ज्ञापन में कई समस्याओं का उल्लेख किया। संगठन का आरोप है कि रेड कैटेगरी के 380 उद्योग, जिनका प्रदूषण इंडेक्स 60 से ज्यादा है, पर्यावरण के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। अब बड़ा सवाल यही है—क्या औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जा रहा है, या फिर प्रदूषण की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है?
मामला सिर्फ हवा में बढ़ते प्रदूषण तक सीमित नहीं है। अभियान की ओर से औद्योगिक कचरे के निपटान को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए। आरोप है कि केंदुवाला में इंडस्ट्रियल वेस्ट को ट्रीट करने के लिए बनाया गया कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट अपेक्षित तरीके से काम नहीं कर रहा, जिसके चलते औद्योगिक अपशिष्ट के जलाशयों में पहुंचने का खतरा बढ़ गया है। इसके साथ ही सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता को लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं। वहीं, माजरा गांव में मौजूद खतरनाक वेस्ट फैसिलिटी से निकलने वाले प्रदूषण को लेकर भी चिंता जताई गई है।
अभियान का कहना है कि अगर प्रदूषण का स्तर इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ सकता है। एलर्जी, सांस से जुड़ी पुरानी बीमारियों से लेकर कैंसर, हृदय रोग, किडनी फेलियर, फैटी लिवर और पेट संबंधी समस्याओं तक कई गंभीर स्वास्थ्य प्रभावों का दावा किया गया है।हालांकि, इन स्वास्थ्य संबंधी दावों के समर्थन में अभियान की ओर से कोई वैज्ञानिक स्टडी या ठोस शोध प्रस्तुत नहीं किया गया। ऐसे में इन दावों की स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि होना अभी बाकी है। सवाल यह है कि औद्योगिक कचरे की मॉनिटरिंग कितनी प्रभावी है? ट्रीटमेंट प्लांट वास्तव में तय मानकों के मुताबिक काम कर रहे हैं या नहीं? और अगर कहीं नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?इलाके में प्रदूषण का मुद्दा अब स्वास्थ्य सुविधाओं से भी जुड़ता नजर आ रहा है। प्रदर्शनकारियों और संगठन से जुड़े लोगों ने कहा कि क्षेत्र में गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए पर्याप्त स्पेशलिटी हेल्थकेयर उपलब्ध नहीं है। उनका कहना है कि प्रदूषण से प्रभावित मरीजों को बेहतर इलाज के लिए PGI चंडीगढ़, IGMC शिमला, AIIMS बिलासपुर और बठिंडा के कैंसर अस्पतालों तक जाना पड़ता है। इसी के साथ औद्योगिक इकाइयों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए। इथेनॉल और डिस्टिलरी प्लांटों तथा दवा निर्माण के लिए कच्चा माल तैयार करने वाले प्लांटों पर प्रदूषण फैलाने और भूजल के अत्यधिक दोहन के आरोप लगाए गए हैं।
एक तरफ उद्योगों से विकास की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ स्थानीय लोग पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर सवाल उठा रहे हैं। संगठन का आरोप है कि प्रदूषण का असर अब सतही जल स्रोतों तक पहुंच चुका है। कुएं, तालाब और सरसा नदी कथित तौर पर जहरीले कचरे से प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर पानी और पर्यावरण ही सुरक्षित नहीं रहेगा, तो विकास का फायदा किसे मिलेगा?



















