मंडी । राजवीर दीक्षित
(Where is the risk of landslides highest in Himachal? AI study raises major concerns regarding the Shimla-Kullu region) हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियां एक बार फिर चिंता के केंद्र में हैं। इस बार वजह सिर्फ लगातार होने वाले भूस्खलन नहीं, बल्कि उन संवेदनशील इलाकों में तेजी से बढ़ता निर्माण भी है। IIT मंडी के रिसर्चर्स की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित एक स्टडी ने हिमाचल में लैंडस्लाइड के खतरे को लेकर चौंकाने वाली तस्वीर सामने रखी है।
रिसर्च के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश के अलग-अलग जिलों में भूस्खलन की आशंका वाले इलाकों में बनी इमारतों की संख्या में काफी अंतर है। इनमें शिमला और कुल्लू ऐसे जिले सामने आए हैं, जहां लैंडस्लाइड के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों में सबसे ज्यादा इमारतें बनी हुई हैं।
स्टडी के आंकड़ों के मुताबिक, शिमला में करीब 35 प्रतिशत और कुल्लू में लगभग 30 प्रतिशत इमारतें उन इलाकों में मौजूद हैं, जिन्हें भूस्खलन के लिए संवेदनशील माना गया है। इसके बाद मंडी में करीब 22 प्रतिशत और सोलन में लगभग 21 प्रतिशत इमारतें ऐसे क्षेत्रों में पाई गईं।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पहाड़ का कौन-सा हिस्सा खिसक सकता है… बड़ा सवाल यह है कि अगर जमीन खिसकी, तो उसकी चपेट में कितनी इमारतें और कितने लोग आ सकते हैं?
इस अध्ययन को IIT मंडी के रिसर्चर्स अंकित सिंह, नितेश धीमान, कीर्ति कुमार महंता और स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग में रिमोट सेंसिंग के प्रोफेसर डेरिक्स पी. शुक्ला ने किया है।
रिसर्चर्स ने हिमाचल प्रदेश में भूस्खलन की संभावित आशंका वाले क्षेत्रों की पहचान करने के लिए मशीन लर्निंग पर आधारित ‘लैंडस्लाइड ससेप्टिबिलिटी मैप्स’ यानी LSMs का इस्तेमाल किया। इन मैप्स के जरिए राज्य के अलग-अलग इलाकों को भूस्खलन के प्रति उनकी संवेदनशीलता के अलग-अलग स्तरों के आधार पर वर्गीकृत किया गया।
इसके लिए रिसर्च में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के तीन प्रमुख मॉडल इस्तेमाल किए गए—Random Forest यानी RF, Support Vector Machine यानी SVM और Multilayer Perceptron यानी MLP।
इन AI मॉडल्स की मदद से तैयार किए गए लैंडस्लाइड ससेप्टिबिलिटी मैप्स को बाद में इमारतों की लोकेशन से जुड़े डेटा के साथ मिलाया गया। इसका मकसद यह समझना था कि जिन इलाकों में भूस्खलन का खतरा ज्यादा है, वहां वास्तव में कितनी इमारतें मौजूद हैं।
यहीं इस स्टडी की सबसे अहम बात सामने आती है।
रिसर्चर्स के मुताबिक, सिर्फ लैंडस्लाइड ससेप्टिबिलिटी मैप तैयार करने से यह तो पता चलता है कि भूस्खलन की संभावना कहां ज्यादा है, लेकिन जब उसी जानकारी को इमारतों की लोकेशन के साथ जोड़ा जाता है, तो खतरे की कहीं ज्यादा व्यावहारिक तस्वीर सामने आती है।
मतलब साफ है—सिर्फ यह जानना काफी नहीं कि जमीन कहां खिसक सकती है। यह जानना भी जरूरी है कि उस जमीन पर क्या-क्या बना हुआ है।
यह निष्कर्ष खास तौर पर हिमाचल के उन घनी आबादी वाले पहाड़ी जिलों के लिए अहम है, जहां शहरी विस्तार और इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास लगातार पहाड़ी ढलानों तक पहुंच रहा है। कई जगहों पर सड़कें, घर, होटल और दूसरी इमारतें ऐसी ढलानों के आसपास विकसित हो रही हैं, जिन्हें भूवैज्ञानिक तौर पर संवेदनशील माना जाता है।
ऐसे में अस्थिर जमीन पर या उसके बेहद करीब निर्माण होने से खतरे का असर कई गुना बढ़ सकता है। अगर भूस्खलन होता है तो इसका असर सिर्फ लोगों के घरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सड़क, बिजली, पानी और दूसरे जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।
हालांकि स्टडी में हिमाचल के सभी जिलों की तस्वीर एक जैसी नहीं मिली। रिसर्च के दौरान ऊना, हमीरपुर और लाहौल-स्पीति में 90 प्रतिशत से ज्यादा इमारतें उन इलाकों के बाहर पाई गईं, जिन्हें भूस्खलन के जोखिम वाले जोन के तौर पर पहचाना गया था।
इसका मतलब यह है कि किसी जिले में भूस्खलन की संवेदनशील जमीन मौजूद होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वहां बनी इमारतों पर भी उतना ही खतरा है। यानी लैंडस्लाइड का खतरा और इंसानी आबादी पर उसका खतरा—दोनों एक ही चीज नहीं हैं।
स्टडी में एक और दिलचस्प पहलू सामने आया। कांगड़ा और किन्नौर जैसे जिलों में भूस्खलन की घटनाएं बार-बार सामने आती हैं, लेकिन वहां इमारतों पर सीधा खतरा अपेक्षाकृत कम पाया गया। आंकड़ों के मुताबिक, कांगड़ा में करीब 5 प्रतिशत और किन्नौर में लगभग 14 प्रतिशत इमारतें ही लैंडस्लाइड जोखिम वाले दायरे में पाई गईं।
रिसर्चर्स का मानना है कि इन जिलों में कई भूस्खलन ऐसे इलाकों में होते हैं, जहां या तो कोई निर्माण नहीं हुआ है या फिर आबादी बेहद कम है। यही वजह है कि किसी जिले में भूस्खलन की घटनाएं ज्यादा होने के बावजूद वहां मौजूद इमारतों का जोखिम अपेक्षाकृत कम हो सकता है। अब जरा शिमला और कुल्लू के आंकड़ों पर गौर कीजिए—35 प्रतिशत और 30 प्रतिशत। इन आंकड़ों की वजह से यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ता शहरीकरण और निर्माण किस हद तक प्राकृतिक जोखिमों को बढ़ा रहा है।
IIT मंडी की यह स्टडी सिर्फ आंकड़े सामने रखने तक सीमित नहीं है। इसके नतीजे शहरी नियोजन और आपदा प्रबंधन के लिए भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। जिला स्तर पर इस तरह के जोखिम आकलन से प्रशासन को यह तय करने में मदद मिल सकती है कि किन क्षेत्रों में ढलान को स्थिर करने के उपायों को प्राथमिकता दी जाए, कहां जमीन के इस्तेमाल से जुड़े नियमों को सख्त किया जाए, किन इलाकों में आपदा से निपटने की तैयारी बढ़ाई जाए और जरूरत पड़ने पर किन स्थानों पर लक्षित राहत एवं बचाव अभियान चलाए जाएं। यानी AI अब सिर्फ खतरे का नक्शा तैयार नहीं कर रहा, बल्कि यह बताने में भी मदद कर सकता है कि उस खतरे के सामने इंसान और उसका बनाया हुआ इंफ्रास्ट्रक्चर कितना असुरक्षित है।
हिमालयी क्षेत्र में विकास के सामने भूस्खलन लगातार एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। पहाड़ों में सड़कें, भवन, पर्यटन सुविधाएं और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी हैं, लेकिन संवेदनशील ढलानों पर अनियोजित निर्माण भविष्य में बड़े खतरे को जन्म दे सकता है।
इसी वजह से रिसर्चर्स का कहना है कि AI आधारित लैंडस्लाइड ससेप्टिबिलिटी मॉडलिंग को बिल्डिंग डेटासेट के साथ जोड़ना आपदा जोखिम के आकलन को एक कदम आगे ले जा सकता है।
पारंपरिक लैंडस्लाइड मैपिंग हमें बताती है कि खतरा कहां है, लेकिन जब उसमें बिल्डिंग डेटा जोड़ा जाता है तो तस्वीर बदल जाती है—अब यह पता लगाया जा सकता है कि खतरे से सबसे ज्यादा प्रभावित होने की संभावना कहां है, कितनी इमारतें उसकी जद में हैं और किन समुदायों तथा जरूरी बुनियादी ढांचे को पहले से तैयार करने की जरूरत है।
और शायद यही इस पूरी स्टडी का सबसे बड़ा संदेश है—पहाड़ पर खतरा सिर्फ वहां नहीं है जहां जमीन खिसक सकती है, बल्कि असली खतरा वहां बढ़ता है जहां उसी अस्थिर जमीन पर इंसानी बस्तियां और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद हैं।
ऐसे में हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य के लिए सवाल सिर्फ विकास की रफ्तार का नहीं, बल्कि सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से विकास करने का भी है। आने वाले समय में AI आधारित तकनीक अगर जमीन के खतरे और इंसानी निर्माण के डेटा को एक साथ पढ़ती है, तो यह प्रशासन को आपदा आने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय आपदा से पहले जोखिम पहचानने और तैयारी करने में ज्यादा सक्षम बना सकती है।


















