नई दिल्ली। राजवीर दीक्षित
(‘Supreme’ showdown over marital rape; Centre says criminalizing it is Parliament’s job) मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को अहम सुनवाई हुई। केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि मैरिटल रेप को अलग अपराध बनाना संसद और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय है। सरकार के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट को अपने फैसले के जरिए ऐसा अपराध बनाने के बजाय मौजूदा कानूनी व्यवस्था के दायरे में ही मामले को देखना चाहिए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि शादी का मतलब महिला की आजादी खत्म होना नहीं है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि मौजूदा कानून के तहत क्या पत्नी की इच्छा के खिलाफ संबंध बनाने के मामले में पति के खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है। मामले की अंतिम सुनवाई करीब तीन सप्ताह बाद होगी।
क्या है मैरिटल रेप की कानूनी छूट?
मौजूदा कानूनी प्रावधान के तहत 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र की पत्नी के साथ पति द्वारा उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाने को बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा गया है। इसी प्रावधान को मैरिटल रेप की कानूनी छूट कहा जाता है।
याचिकाकर्ताओं ने इसी छूट को चुनौती दी है और इसे खत्म करने की मांग की है।
याचिकाकर्ताओं की दलील- शादी जबरदस्ती की इजाजत नहीं
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विवाह किसी पति को पत्नी की इच्छा के खिलाफ जबरन संबंध बनाने का अधिकार नहीं देता। उनका तर्क है कि यदि किसी महिला के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध गंभीर यौन हिंसा होती है, तो केवल वैवाहिक संबंध के आधार पर पति को कानूनी कार्रवाई से छूट नहीं मिलनी चाहिए।
याचिकाकर्ताओं की मांग है कि शादीशुदा महिलाओं को भी जबरन यौन संबंध के खिलाफ वही कानूनी सुरक्षा मिले, जो अन्य महिलाओं को उपलब्ध है।
केंद्र सरकार क्यों कर रही विरोध?
केंद्र सरकार मैरिटल रेप को अलग अपराध के रूप में शामिल करने के पक्ष में नहीं है। सरकार का कहना है कि इसके लिए अलग आपराधिक प्रावधान बनाने से विवाह संस्था और पति-पत्नी के रिश्ते पर व्यापक असर पड़ सकता है।
सरकार के मुताबिक, वैवाहिक संबंधों में होने वाली यौन हिंसा से जुड़े मामलों को मौजूदा कानूनों के तहत निपटाने के लिए पहले से कई कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। इस मुद्दे पर सामाजिक, कानूनी और व्यावहारिक पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने दो बड़े सवाल
सुनवाई के दौरान मामले में मुख्य रूप से दो संवैधानिक और कानूनी सवाल महत्वपूर्ण हैं—
- यदि BNS में मैरिटल रेप की मौजूदा छूट बनी रहती है, तो क्या फिर भी पति के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा चलाया जा सकता है? क्या यह छूट संविधान के अनुरूप है?
- जिस कृत्य को मौजूदा कानून अपराध नहीं मानता, क्या सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले से उसे अपराध घोषित कर सकता है या इसके लिए संसद को कानून में बदलाव करना होगा?
दिल्ली हाईकोर्ट के अलग-अलग फैसलों के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
मामला पहले 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा था। वहां दो जजों की पीठ ने अलग-अलग राय दी थी।
जस्टिस राजीव शकधर ने मैरिटल रेप की कानूनी छूट को असंवैधानिक माना था। वहीं, जस्टिस सी. हरिशंकर ने इस छूट को बरकरार रखने के पक्ष में फैसला दिया था।
दोनों जजों की अलग-अलग राय के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अब शीर्ष अदालत यह तय करेगी कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में मैरिटल रेप की छूट संवैधानिक है या नहीं और इस मुद्दे पर बदलाव का अधिकार अदालत के पास है या संसद के पास।



















