नई दिल्ली। राजवीर दीक्षित
(SC tough on party symbol issue, terms defection a ‘constitutional sin’; questions Shinde faction’s arguments) शिवसेना के धनुष-बाण चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को अहम सुनवाई हुई। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने शिंदे गुट को चुनाव चिह्न देने के चुनाव आयोग के फैसले पर कई सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि दलबदल के आरोपों से घिरे विधायकों को पार्टी का आरक्षित चुनाव चिह्न देने का आधार क्या हो सकता है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल उठाया कि क्या चुनाव चिह्न का अधिकार उन लोगों को दिया जा सकता है, जिन पर ‘संवैधानिक पाप’ यानी दलबदल का आरोप है, या फिर उन लोगों को जिन्होंने इसकी शिकायत की है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या चुनाव आयोग दोनों गुटों को मूल चुनाव चिह्न देने से इनकार कर उन्हें अलग-अलग निशानों पर चुनाव लड़ने का विकल्प दे सकता था।
शिंदे गुट ने विधायी बहुमत को बनाया आधार
शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने दलील दी कि चुनाव आयोग ने विधायी बहुमत के आधार पर फैसला लेकर कानून के मुताबिक काम किया। उन्होंने कहा कि चुनाव चिह्न आदेश के तहत यह देखने के लिए विधायी संख्या प्रासंगिक कसौटी है कि किसी राजनीतिक दल पर किस गुट का दावा मजबूत है।
कौल ने संविधान पीठ के सुभाष देसाई मामले समेत कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने विधायी बहुमत की कसौटी के इस्तेमाल पर रोक नहीं लगाई है। उनके मुताबिक, अयोग्यता की कार्यवाही लंबित होने मात्र से चुनाव आयोग को चुनाव चिह्न विवाद पर फैसला लेने से नहीं रोका जा सकता।
40 विधायक और 13 सांसदों का आंकड़ा पेश
शिंदे गुट ने अपने पक्ष में विधायकों और सांसदों की संख्या का भी हवाला दिया। कौल के मुताबिक, शिंदे समर्थक 40 विधायक, 2019 में चुने गए शिवसेना के 55 विधायकों को मिले कुल वोटों का करीब 76% प्रतिनिधित्व करते थे।
इसी तरह लोकसभा के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि शिंदे समर्थक 13 सांसद, शिवसेना के 18 निर्वाचित सांसदों को मिले कुल वोटों का करीब 73% प्रतिनिधित्व करते थे।
उद्धव गुट ने चुनाव आयोग के फैसले को दी चुनौती
शिवसेना विवाद से जुड़ी याचिकाओं में उद्धव ठाकरे गुट ने चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना मानते हुए धनुष-बाण चुनाव चिह्न दिया गया था। वहीं सुनील प्रभु की याचिका में महाराष्ट्र विधानसभा के तत्कालीन स्पीकर के 10 जनवरी 2024 के फैसले को भी चुनौती दी गई है, जिसमें शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य ठहराने से इनकार किया गया था।
मंगलवार की सुनवाई पूरी नहीं हो सकी। मामले की सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी।


















