नई दिल्ली।राजवीर दीक्षित
भाखड़ा-ब्यास परियोजनाओं से जुड़े बिजली बकाया भुगतान को लेकर पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के बीच करीब छह दशक से चला आ रहा विवाद आखिरकार खत्म हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए तय किया कि पंजाब और हरियाणा अगले 20 वर्षों में हिमाचल प्रदेश को 11,973 मिलियन यूनिट (MU) बिजली देंगे।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्र के नकद भुगतान के बजाय बिजली के रूप में बकाया चुकाने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2011 के फैसले के अनुरूप होगी, जिसमें हिमाचल प्रदेश का बिजली में हिस्सा 7.19 प्रतिशत निर्धारित किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, पंजाब और हरियाणा को मिलकर हिमाचल प्रदेश को 11,973 मिलियन यूनिट बिजली उपलब्ध करानी होगी। इस विवाद का संबंध वर्ष 1966 से भाखड़ा-नांगल और ब्यास जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े बिजली बकाये से है।
इससे पहले भुगतान की समयसीमा को लेकर तीनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी। पंजाब सरकार ने शुरुआत में 15 वर्षों में बकाया चुकाने के केंद्र के प्रस्ताव का विरोध किया था। बाद में पंजाब ने इसे 30 वर्षों में लागू करने की मांग की, जबकि हिमाचल प्रदेश चाहता था कि भुगतान 10 वर्षों के भीतर पूरा हो।
केंद्र सरकार के प्रस्ताव में बांधों के निर्माण पर हुए ऐतिहासिक पूंजीगत खर्च के मद में 420 करोड़ रुपये का समायोजन भी शामिल किया गया है। इस व्यवस्था के तहत हिमाचल प्रदेश को पंजाब और हरियाणा को कोई राशि नहीं चुकानी होगी।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) ने हिमाचल प्रदेश का मूल बिजली अधिकार 13,066 मिलियन यूनिट आंका था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की मंजूर व्यवस्था के तहत अब 11,973 मिलियन यूनिट बिजली देने पर सहमति बनी है।
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2011 के फैसले में भाखड़ा-ब्यास परियोजनाओं से बिजली हिस्सेदारी का अनुपात तय किया था।
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हिमाचल प्रदेश: 7.19 प्रतिशत
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पंजाब: 51.80 प्रतिशत
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हरियाणा: 37.51 प्रतिशत
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चंडीगढ़: 3.50 प्रतिशत
राजस्थान की हिस्सेदारी में इस व्यवस्था से कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ था।
फैसले के अनुसार, हिमाचल प्रदेश को भाखड़ा परियोजना में 1 नवंबर 1966 से, देहर परियोजना में नवंबर 1977 से और पोंग बांध परियोजना में जनवरी 1978 से बिजली का हिस्सा मिलना था।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से हिमाचल प्रदेश के लंबे समय से लंबित बिजली बकाये के विवाद का समाधान हो गया है। अब अगले 20 वर्षों तक पंजाब और हरियाणा को निर्धारित व्यवस्था के तहत हिमाचल को बिजली देनी होगी।


















