Home Food पैकेट के सामने लगेगा ‘रेड वार्निंग’ लेबल, लेकिन नए  नियमों पर उठे सवाल; FSSAI की पहल कितनी

पैकेट के सामने लगेगा ‘रेड वार्निंग’ लेबल, लेकिन नए  नियमों पर उठे सवाल; FSSAI की पहल कितनी

पैकेट के सामने लगेगा ‘रेड वार्निंग’ लेबल, लेकिन नए  नियमों पर उठे सवाल; FSSAI की पहल कितनी

नई दिल्ली । राजवीर दीक्षित

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) की ओर से प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों में हानिकारक तत्वों को लेकर पैकेट के सामने चेतावनी लेबल लगाने का फैसला स्वागत योग्य पहला कदम है। हालांकि, यह फैसला काफी देर से आया है। इसके पहले ड्राफ्ट को तैयार हुए 10 साल से अधिक समय बीत चुका है। इसके बावजूद नए नियमों के असर को लेकर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि यह व्यवस्था प्रोसेस्ड फूड बाजार के 20 प्रतिशत से भी कम हिस्से को कवर कर पाएगी।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि नए चेतावनी लेबल में पैकेट में मौजूद कुल चीनी, वसा और नमक के बजाय केवल अतिरिक्त चीनी, वसा और नमक को आधार बनाया जाएगा। वहीं, घी और तेल जैसे ऐसे उत्पाद, जिनमें प्राकृतिक रूप से वसा की मात्रा अधिक होती है, चेतावनी लेबल से बाहर रहेंगे।
पहले चरण में यह चेतावनी केवल उन्हीं उत्पादों पर लागू होगी, जिनमें तीन में से कम से कम दो पोषक तत्व निर्धारित सीमा से अधिक पाए जाते हैं। ये सीमाएं भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की 2024 की डाइटरी गाइडलाइंस के आधार पर तय की गई हैं।
इस फैसले को लेकर याचिकाकर्ताओं में शामिल अरुण गुप्ता ने कहा कि FSSAI का लाल हेक्सागोनल चेतावनी लेबल आगे बढ़ने की दिशा में कदम है, लेकिन ‘दो या अधिक’ पोषक तत्वों की सीमा एक बड़ी खामी है। उनका तर्क है कि अगर किसी उत्पाद में चीनी की मात्रा बहुत अधिक है, लेकिन उसमें वसा और नमक कम है, तो उस पर कोई चेतावनी नहीं लगेगी। उन्होंने HFSS यानी हाई फैट, शुगर और साल्ट वाले खाद्य पदार्थों की परिभाषा में कुल चीनी और वसा को शामिल करने की जरूरत बताई।

भारत में बीमारियों के बोझ से जुड़ी बड़ी चिंता
ICMR की गाइडलाइंस में 2019 के नेशनल न्यूट्रिशन सर्वे का हवाला देते हुए कहा गया है कि भारत में कुल बीमारी के बोझ का 56.4 प्रतिशत हिस्सा अस्वास्थ्यकर खान-पान से जुड़ा है।
रिपोर्ट के अनुसार, चीनी और वसा से भरपूर अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत, कम होती शारीरिक गतिविधि और विविध खाद्य पदार्थों तक सीमित पहुंच माइक्रोन्यूट्रिएंट की कमी के साथ-साथ अधिक वजन और मोटापे की समस्या को बढ़ा रही है।
शोध में यह भी सामने आया है कि HFSS यानी ज्यादा वसा, चीनी और नमक वाले अस्वास्थ्यकर प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ स्वस्थ विकल्पों की तुलना में अधिक सस्ते और आसानी से उपलब्ध हो गए हैं। इसका असर खास तौर पर युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है।

बच्चों पर ज्यादा गंभीर असर का खतरा
विशेषज्ञों और अध्ययनों के अनुसार, HFSS खाद्य पदार्थों का बच्चों पर वयस्कों की तुलना में अधिक असर पड़ सकता है, क्योंकि उनका शरीर अभी विकास की प्रक्रिया में होता है। ज्यादा चीनी और नमक के सेवन की आदत आगे चलकर मधुमेह और हृदय संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकती है तथा खान-पान में असंतुलन पैदा कर सकती है।
ऐसे में आलोचकों का कहना है कि FSSAI के पास भारत में HFSS खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत, खासकर बच्चों और युवाओं के बीच, पर प्रभावी नियंत्रण के लिए कड़े कदम उठाने का एक महत्वपूर्ण मौका था।
यूरोप और मैक्सिको के मॉडल क्यों नहीं अपनाए गए?

FMCG उद्योग पर असर को लेकर सरकार की चिंता
इस व्यवस्था को लेकर एक बड़ा सवाल FMCG यानी
फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स उद्योग पर पड़ने वाले प्रभाव का भी है। यह देश में बड़े पैमाने पर रोजगार देने वाला क्षेत्र है और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
खाद्य उद्योग लंबे समय से दावा करता रहा है कि बहुत सख्त लेबलिंग नियमों से खासकर छोटी कंपनियों पर बड़ा आर्थिक दबाव पड़ सकता है।

भारत और यूरोप में एक ही उत्पाद के अलग मानक?
FSSAI के खाद्य सुरक्षा मानकों की तुलना यूरोप और अमेरिका के नियमों से भी की जा रही है। आलोचकों का कहना है कि विदेशी बाजारों की तुलना में भारत में कुछ खाद्य उत्पादों के लिए मानक अपेक्षाकृत कम सख्त हैं।
उदाहरण के तौर पर, रिपोर्ट में Fanta और Maggi का जिक्र किया गया है। दावा है कि भारत में Fanta में यूरोप की तुलना में अधिक चीनी और सिंथेटिक रंग पाए जाते हैं, जबकि यूरोप में कम चीनी और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह भारत में Maggi में नमक की मात्रा अधिक और पाम ऑयल का इस्तेमाल होने की बात कही गई है, जबकि यूरोप में सनफ्लावर ऑयल का इस्तेमाल किया जाता है।
इससे सवाल उठता है कि एक ही ब्रांड के एक जैसे उत्पाद के लिए अलग-अलग देशों में गुणवत्ता के अलग मानक क्यों हैं?
अगर FSSAI के मौजूदा मानकों के कारण कुछ उत्पाद चेतावनी की सीमा तक नहीं पहुंचते, तो संभव है कि Fanta या Maggi जैसे लोकप्रिय उत्पादों पर प्रस्तावित लाल चेतावनी दिखाई ही न दे। वहीं, अधिक चीनी या नमक वाले कुछ अन्य उत्पादों, जैसे कम गुणवत्ता वाले केचप या बिस्किट पर चेतावनी लग सकती है।

फिर भी शुरुआत को माना जा रहा है सकारात्मक

FSSAI की आलोचनाओं के बावजूद, पैकेट के सामने चेतावनी लेबल लगाने की शुरुआत को एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है। दुनिया के कई देशों के अनुभव बताते हैं कि ऐसे फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल ज्यादा चीनी, वसा और नमक वाले खाद्य पदार्थों की खपत को कम करने में मदद कर सकते हैं।
चिली, मैक्सिको और इजरायल जैसे देशों में चेतावनी व्यवस्था लागू होने के दो साल के भीतर अस्वास्थ्यकर पोषक तत्वों की खपत में लगभग 15–20 प्रतिशत की कमी देखे जाने का दावा किया गया है।
भारत में भी इसका असर देखने को मिल सकता है, लेकिन इसके लिए जरूरी होगा कि दोनों चरणों को तेजी से लागू किया जाए और छोटी कंपनियों के उत्पादों सहित ज्यादा से ज्यादा खाद्य पदार्थों को इसके दायरे में लाया जाए।
फिलहाल, उपभोक्ताओं के सामने इंतजार करने और यह देखने की स्थिति है कि नई चेतावनी व्यवस्था वास्तव में बाजार और लोगों की खाने की आदतों पर कितना असर डालती है।

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