टारगेट न्यूज़ ब्यूरो: पंजाब के एक प्रतिष्ठित निजी विश्वविद्यालय में हाल ही में भड़की व्यापक हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ के मामलों की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की मांग को लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। इस याचिका में राजनीतिक कारणों और गहरी साजिश का हवाला देते हुए राज्य की कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। याचिकाकर्ता ने अदालत से इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की गुहार लगाई है ताकि सच्चाई सामने आ सके और परिसरों में शिक्षा का माहौल सुरक्षित रखा जा सके।
मुख्य बिंदु एवं हाइलाइट्स (Key Highlights)
- लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) परिसर में हाल ही में हुई हिंसा और आगजनी की सीबीआई जांच की मांग।
- याचिका में विश्वविद्यालय के संस्थापक और चांसलर के राजनीतिक रसूख तथा घटना के पीछे राजनीतिक साजिश का दावा।
- सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक फर्जी और असत्यापनित पोस्ट के बाद लगभग 2,000 छात्रों और बाहरी तत्वों द्वारा उग्र प्रदर्शन।
- एनएच-44 पर जाम, परिसरों में तोड़फोड़, आगजनी, एटीएम और दुकानों में लूटपाट के गंभीर आरोप।
- पुलिस की कार्यप्रणाली और विरोधाभासी बयानों पर सवाल, बिना ठोस सबूत के एफआईआर दर्ज करने का दावा।
विस्तृत समाचार एवं पूरा घटनाक्रम (Detailed Report)
याचिकाकर्ता रवि राज ने अपनी जनहित याचिका के माध्यम से अदालत को बताया है कि 26 सितंबर की रात को विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच एक झूठी और भ्रामक सोशल मीडिया पोस्ट तेजी से वायरल हुई थी। इस पोस्ट में दावा किया गया था कि परिसर के अंदर एक कर्मचारी द्वारा एक छात्रा के साथ दुष्कर्म किया गया है और विश्वविद्यालय प्रबंधन ने मामले को दबाने के लिए पीड़िता को घर भेज दिया है, जिसकी बाद में आत्महत्या से मौत हो गई। इस सनसनीखेज और बिना जांचे-परखे संदेश के आधार पर रातोंरात करीब 2,000 छात्र और बाहरी लोग जीएच-3 हॉस्टल के बाहर जमा हो गए। हालात इतनी तेजी से बिगड़े कि भोर होने से पहले ही उग्र भीड़ ने फगवाड़ा और जालंधर के बीच स्थित नेशनल हाईवे नंबर 44 को जाम कर दिया। इसके बाद उपद्रवियों ने रातभर और अगले दिन सुबह तक विश्वविद्यालय परिसर में जमकर तांडव मचाया, कई इमारतों में आग लगा दी, दरवाजे और कांच तोड़ दिए तथा सुरक्षाकर्मियों पर भी घातक हमले किए।
याचिका में यह भी सनसनीखेज खुलासा किया गया है कि इस हिंसा में शामिल होने वाले अधिकांश लोग साधारण छात्र नहीं बल्कि सुनियोजित तरीके से बाहर से बुलाए गए उपद्रवी थे। याचिकाकर्ता के अनुसार, बड़ी संख्या में अज्ञात पुरुष और महिलाएं खुली गाड़ियों में सवार होकर परिसर में घुसे, जिनके हाथों में तलवारें, लोहे की रॉड, लाठी-डंडे और हथियार थे। उनके चेहरे ढंके हुए थे और वे वॉककी-टॉकी का इस्तेमाल कर रहे थे। इन लोगों ने मुख्य द्वारों को बलपूर्वक तोड़कर आपराधिक अतिचार किया और सीसीटीवी कैमरों, कंप्यूटरों, एलईडी स्क्रीनों तथा टर्नस्टाइल गेटों को पूरी तरह नष्ट कर दिया। इसके अलावा परिसरों में स्थित दुकानों, बैंक शाखाओं और एटीएम को भी निशाना बनाया गया। याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि यह पूरा घटनाक्रम किसी स्वतःस्फूर्त विरोध प्रदर्शन का हिस्सा नहीं था, बल्कि राज्य का माहौल खराब करने और विश्वविद्यालय की छवि को धूमिल करने के लिए रची गई एक गहरी साजिश थी।
घटना के समय पुलिस की भूमिका पर भी याचिका में गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि पुलिस को रात करीब 1:45 बजे ही भीड़ के जुटने की सूचना मिल चुकी थी, इसके बावजूद घंटों तक हाईवे जाम रहा, आगजनी और लूटपाट होती रही और पुलिस ने कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की। पुलिस अधिकारियों द्वारा दिए गए बयान भी आपस में मेल नहीं खा रहे थे। शुरुआत में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने इन सभी दावों को पूरी तरह अफवाह करार दिया था, लेकिन बाद में बिना किसी ठोस सबूत और अज्ञात पीड़िता के आधार पर भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया गया, जिससे पुलिस की कार्यशैली पर संदेह पैदा होता है।
याचिका में कहा गया है कि इस तरह की सुनियोजित हिंसा से न केवल शैक्षणिक संस्थानों की गरिमा को ठेस पहुंचती है, बल्कि पूरे राज्य में डर और असुरक्षा का माहौल पैदा होता है, जिसकी निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है।
भविष्य का असर एवं निष्कर्ष (Future Impact & Conclusion)
इस हाई-प्रोफाइल मामले के पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचने के बाद राज्य के राजनीतिक हलकों और शैक्षणिक संस्थानों में हड़कंप मच गया है। मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ द्वारा इस जनहित याचिका पर सुनवाई किए जाने की संभावना है, जिससे आने वाले दिनों में राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन की जवाबदेही तय हो सकती है। इस मामले की न्यायिक निगरानी या सीबीआई जांच के आदेश से न केवल एलपीयू हिंसा के असली चेहरों बेनकाब होंगे, बल्कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए एक कड़ा संदेश भी जाएगा। उच्च न्यायालय के फैसले पर अब पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हुई हैं।



















