शिमला । राजवीर दीक्षित
(Posting of over 5,000 teachers stalled! Wait for appointments in CBSE schools continues) हिमाचल प्रदेश में CBSE से जुड़े 145 सरकारी स्कूलों में तैनाती का इंतजार कर रहे 5 हजार से ज्यादा सरकारी शिक्षकों का सब्र अब टूटने लगा है। स्क्रीनिंग परीक्षा पास करने के बावजूद ये शिक्षक महीनों से पोस्टिंग का इंतजार कर रहे हैं। परीक्षा हुई, मेरिट लिस्ट जारी हुई, काउंसलिंग की घोषणा भी हुई, लेकिन इसके बाद भी तैनाती की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। लगातार टलती काउंसलिंग और बढ़ती अनिश्चितता के बीच अब कई शिक्षक अपने उस फैसले पर भी पछतावा जता रहे हैं, जिसके तहत उन्होंने स्क्रीनिंग परीक्षा में हिस्सा लिया था। शिक्षकों की मांग है कि सरकार अपने वादे को पूरा करे और बिना किसी और देरी के CBSE स्कूलों में तैनाती की प्रक्रिया पूरी करे। उनका कहना है कि जब सरकार ने खुद मेरिट के आधार पर पोस्टिंग देने की नीति बनाई थी, तो अब उसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में इतनी देरी क्यों की जा रही है।
दरअसल, ‘हिमाचल प्रदेश में CBSE से जुड़े स्कूलों के लिए शिक्षकों का सब-कैडर बनाने की एक सब-स्कीम’ के तहत सरकार ने इन स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती के लिए एक विशेष प्रक्रिया तैयार की थी। इसके तहत हिमाचल प्रदेश बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन यानी HPBOSE की ओर से स्क्रीनिंग परीक्षा आयोजित की गई और परीक्षा में प्रदर्शन के आधार पर मेरिट तैयार कर शिक्षकों को CBSE स्कूलों में पोस्टिंग देने का प्रावधान किया गया।
सरकार की ओर से इस योजना की औपचारिक घोषणा 11 फरवरी 2026 को की गई थी। इसके बाद प्रॉस्पेक्टस जारी किया गया, राज्य स्तर पर स्क्रीनिंग परीक्षा करवाई गई, मेरिट लिस्ट प्रकाशित की गई और काउंसलिंग की घोषणा भी कर दी गई। लेकिन कोर्ट में मामला पहुंचने और उसके बाद पैदा हुई परिस्थितियों के कारण पूरी प्रक्रिया अधूरी रह गई। उम्मीदवार वीरेंद्र चौहान ने इस देरी पर नाराजगी जताते हुए कहा कि यह देखना बेहद निराशाजनक है कि सरकार इस मामले में लगातार टालमटोल कर रही है। उनका कहना है कि अगर सरकार को इस नीति को लागू ही नहीं करना था, तो हजारों शिक्षकों को स्क्रीनिंग परीक्षा में बैठने की परेशानी क्यों उठानी पड़ी।
वीरेंद्र चौहान अकेले नहीं हैं। उन्होंने 56 अन्य शिक्षकों के साथ मिलकर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इन शिक्षकों ने अदालत से मांग की है कि उन्हें सरकार द्वारा किए गए वादे के मुताबिक CBSE स्कूलों में तैनाती दी जाए। शिक्षकों का कहना है कि लगातार हो रही देरी ने न सिर्फ उनका मनोबल गिराया है, बल्कि इससे यह संदेश भी जा रहा है कि आखिर मेरिट का महत्व कितना है।
कुल्लू की एक शिक्षिका ने भी इस देरी पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि हजारों कार्यरत शिक्षकों के लिए यह केवल प्रशासनिक असुविधा का मामला नहीं है। उनकी नौकरी से जुड़े फैसले, भविष्य की योजनाएं, पोस्टिंग, परिवार और निजी परिस्थितियां पिछले कई महीनों से अधर में लटकी हुई हैं। इन शिक्षकों ने स्क्रीनिंग परीक्षा इसलिए दी थी क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि परीक्षा पास करने के बाद उन्हें अपनी पसंद और मेरिट के आधार पर CBSE स्कूल में तैनाती मिल सकेगी। मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि सरकार की ओर से लगातार यह कहा गया था कि CBSE स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती मेरिट के आधार पर होगी। CBSE स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती की निगरानी के लिए डिप्टी सीएम मुकेश अग्निहोत्री की अध्यक्षता में कैबिनेट सब-कमेटी भी बनाई गई थी। इस कमेटी की ओर से भी कहा गया था कि पोस्टिंग मेरिट के आधार पर ही की जाएगी।
लेकिन अब शिक्षकों के बीच यही सवाल उठ रहा है कि अगर पूरी प्रक्रिया मेरिट पर आधारित थी, तो फिर उसे लागू करने में इतनी लंबी देरी क्यों हो रही है। देरी को लेकर जब शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री खुद CBSE स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती के मामले को देख रहे हैं। हालांकि, शिक्षकों का इंतजार अभी खत्म नहीं हुआ है।
इस बीच शिक्षकों की ओर से एक और गंभीर आरोप लगाया गया है। उनका कहना है कि कई राजनीतिक रूप से रसूखदार और प्रभावशाली शिक्षक अब भी CBSE स्कूलों में काम कर रहे हैं। आरोप है कि इनमें से कई शिक्षक जिला मुख्यालयों और अपनी पसंदीदा जगहों पर तैनात हैं।
सरकार की बनाई गई नीति के मुताबिक जो शिक्षक स्क्रीनिंग परीक्षा में शामिल नहीं हुए थे, उन्हें CBSE स्कूलों से दूसरी जगह ट्रांसफर किया जाना था। इसके बाद स्क्रीनिंग परीक्षा में मेरिट हासिल करने वाले शिक्षकों के लिए इन स्कूलों में जगह बनाई जानी थी। लेकिन शिक्षकों का आरोप है कि यह प्रक्रिया जमीन पर लागू नहीं हुई।
मामला यहीं खत्म नहीं होता। सरकार ने हिमाचल प्रदेश राज्य चयन आयोग के माध्यम से पांच साल की अवधि के लिए अस्थायी शिक्षकों की नियुक्ति करके इन CBSE स्कूलों में खाली पदों को भी भर दिया है। शिक्षा विभाग का कहना है कि स्क्रीनिंग परीक्षा पास करने वाले शिक्षकों को CBSE स्कूलों में तैनाती के लिए तभी कंसीडर किया जाएगा, जब वहां पद खाली होंगे।
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब कार्यरत शिक्षकों के एक समूह ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इन शिक्षकों ने सरकार के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसके तहत अनुभवी सरकारी शिक्षकों को CBSE से जुड़े स्कूलों में तैनाती हासिल करने के लिए एक नई लिखित परीक्षा देनी थी।
हालांकि, हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। अदालत ने माना कि लिखित परीक्षा और उसके बाद होने वाली काउंसलिंग की प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी तरीका है।
अब कुल्लू की शिक्षिका इसी फैसले के आधार पर सवाल उठा रही हैं। उनका कहना है कि जिस प्रक्रिया को सरकार ने खुद अदालत के सामने निष्पक्ष और पारदर्शी बताया था, उसे समय पर और उसी पारदर्शिता के साथ लागू करना आखिर इतना मुश्किल क्यों साबित हो रहा है।
वहीं एक अन्य शिक्षक का कहना है कि CBSE स्कूलों के लिए अलग सब-कैडर बनाने की पहल अपने आप में अच्छी थी और इससे शिक्षकों को बेहतर अवसर मिलने की उम्मीद जगी थी। लेकिन जिस तरीके से इसे लागू किया जा रहा है, उसमें गंभीर कमियां सामने आ रही हैं।
शिक्षक का कहना है कि लगातार हो रही टालमटोल ने शिक्षकों के बीच जबरदस्त अनिश्चितता पैदा कर दी है। स्थिति यह है कि न तो इस समय CBSE स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षक पूरी तरह निश्चिंत हैं और न ही वे शिक्षक जो स्क्रीनिंग परीक्षा पास करके नई पोस्टिंग का इंतजार कर रहे हैं।
पूरे मामले में अब शिक्षकों की नजर सरकार के अगले कदम पर टिकी है। परीक्षा से लेकर मेरिट लिस्ट और काउंसलिंग तक की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी अगर तैनाती लंबित रहती है, तो स्वाभाविक तौर पर शिक्षकों के बीच नाराजगी बढ़ती जा रही है।
इन शिक्षकों का कहना है कि उन्होंने सरकार की नीति पर भरोसा किया, परीक्षा दी, मेरिट हासिल की और पोस्टिंग की उम्मीद लगाई। अब उन्हें सिर्फ इतना चाहिए कि सरकार प्रक्रिया को और लंबा खींचने के बजाय अपने वादे को पूरा करे और CBSE से जुड़े 145 सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती की प्रक्रिया को जल्द से जल्द अंतिम रूप दे।
क्योंकि अब मामला सिर्फ पोस्टिंग का नहीं है—मामला उस भरोसे का है, जो हजारों शिक्षकों ने सरकार की घोषित नीति और मेरिट आधारित चयन प्रक्रिया पर किया था।


















