समराला । राजवीर दीक्षित
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) सतवीर कौर की अदालत ने पुलिस अधिकारी गुरमुख सिंह की ओर से दायर मानहानि की शिकायत में पूर्व अकाली विधायक, समराला नगर परिषद के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और पूर्व पार्षदों समेत छह लोगों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो सके।
बरी किए गए आरोपियों में समराला के पूर्व अकाली विधायक जगजीवन सिंह खिरनिया, नगर परिषद अध्यक्ष मंगत राय उर्फ लाला, उपाध्यक्ष डॉ. सिकंदर सिंह, पूर्व पार्षद सतवीर सिंह सेखों, वार्ड नंबर 2 के पूर्व पार्षद अवतार सिंह और वार्ड नंबर 5 के अवतार सिंह शामिल हैं।
आरोपियों पर आरोप था कि उन्होंने पुलिस अधिकारियों को शिकायतें देकर शिकायतकर्ता गुरमुख सिंह के खिलाफ झूठे आरोप लगाए, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।
क्या था पूरा मामला?
शिकायतकर्ता गुरमुख सिंह, जो पुलिस विभाग में कार्यरत हैं, ने आरोप लगाया था कि पूर्व पार्षद सतवीर सिंह सेखों ने लुधियाना के पुलिस कमिश्नर को शिकायत देकर आरोप लगाया था कि गुरमुख सिंह अपराध शाखा में कार्यरत रहते हुए अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर अपराधियों से जुड़े हुए हैं और आपराधिक तथा नशा तस्करी से संबंधित मामलों में शामिल लोगों को संरक्षण देते हैं।
शिकायतकर्ता के अनुसार, एक अन्य आरोपी ने भी शिकायत देकर आरोप लगाया था कि उनके वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से संबंध हैं और उन्होंने आरोपी तथा उसके परिवार के सदस्यों को धमकाया है।
गुरमुख सिंह ने दावा किया था कि ये शिकायतें झूठी और मानहानिकारक थीं। उनका उद्देश्य उनकी सरकारी नौकरी को खतरे में डालना और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना था।
अदालत में पेश किए गए सबूत
कार्यवाही के दौरान शिकायतकर्ता ने स्वयं और तीन अन्य गवाहों के बयान दर्ज करवाए। इसके अलावा, पुलिस अधिकारियों को दी गई शिकायतों की प्रतियां और जांच रिपोर्ट सहित कई दस्तावेज अदालत में पेश किए गए।
हालांकि, बचाव पक्ष ने दलील दी कि शिकायतें संबंधित कानूनी अधिकारियों के समक्ष सद्भावना के साथ दी गई थीं। इसलिए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 499 के आठवें अपवाद के तहत उन्हें मानहानि नहीं माना जा सकता।
जांच रिपोर्ट में क्या सामने आया?
अदालत ने पाया कि शिकायतों से संबंधित जांच रिपोर्टों में ऐसा कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं था कि शिकायतें शिकायतकर्ता को बदनाम करने के इरादे से झूठी दर्ज करवाई गई थीं।
इसके बजाय, जांच रिपोर्टों में कहा गया था कि आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत या गवाह प्रस्तुत नहीं किया गया। रिपोर्टों में यह भी संकेत दिया गया कि दोनों पक्षों के बीच आपसी रंजिश के कारण शिकायतें की गई हो सकती हैं।
अदालत ने यह भी गौर किया कि जिरह के दौरान शिकायतकर्ता ने स्वयं स्वीकार किया था कि जांच रिपोर्टों में इन आवेदनों को झूठा नहीं बताया गया था। हालांकि, उन्होंने अपनी ओर से कहा कि शिकायतों में लगाए गए आरोपों में कोई सच्चाई नहीं पाई गई थी।
मानहानि पर अदालत की अहम टिप्पणी
अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 499 के आठवें अपवाद का हवाला देते हुए कहा कि किसी ऐसे व्यक्ति या प्राधिकारी के समक्ष सद्भावना से लगाया गया आरोप, जिसे संबंधित मामले पर कानूनी अधिकार प्राप्त हो, मानहानि की श्रेणी में नहीं आता।
अदालत ने बचाव पक्ष की क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र संबंधी दलील में भी दम पाया। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता और आरोपी समराला के स्थायी निवासी थे तथा कथित घटना भी समराला से संबंधित थी। इसके बावजू शिकायत समराला की अदालत में दाखिल करने के बजाय लुधियाना में दायर की गई थी।
संदेह से परे आरोप साबित नहीं कर सका अभियोजन पक्ष
सभी तथ्यों, दस्तावेजों और दलीलों पर विचार करने के बाद अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है।
इसके बाद अदालत ने मानहानि की शिकायत खारिज करते हुए पूर्व अकाली विधायक जगजीवन सिंह खिरनिया, नगर परिषद अध्यक्ष मंगत राय उर्फ लाला, उपाध्यक्ष डॉ. सिकंदर सिंह और तीन अन्य आरोपियों सहित सभी छह लोगों को बरी कर दिया।


















