Home India भारत का दो टूक जवाब- तेल जहां सस्ता, वहीं से खरीदेंगे

भारत का दो टूक जवाब- तेल जहां सस्ता, वहीं से खरीदेंगे

नई दिल्ली। राजवीर दीक्षित 

(India’s blunt response: We will buy oil from wherever it is cheaper.) रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत ने अपना रुख साफ किया है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि भारत अचानक रूस से तेल खरीदना बंद करके दूसरे सप्लायर्स पर तुरंत शिफ्ट नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि करीब 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए भारत उन सभी स्रोतों से तेल खरीदेगा जहां यह पर्याप्त मात्रा में और आर्थिक रूप से व्यवहार्य शर्तों पर उपलब्ध होगा।

सीतारमण ने मंगलवार को BusinessLine Changemaker Awards में कहा कि अगर भारत अचानक रूसी तेल से हटता है तो उपलब्ध वैश्विक सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है और कीमतों में तेजी आ सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय रिफाइनरियों की तकनीकी संरचना अलग-अलग तरह के कच्चे तेल के अनुरूप होती है, इसलिए केवल नया सप्लायर ढूंढना ही पर्याप्त नहीं है।

अमेरिका ने ट्रंप को 100% टैरिफ लगाने की ताकत दी

रूसी तेल को लेकर भारत की स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नए कानून के तहत रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिला है। हालांकि, कानून अपने आप किसी देश पर 100% टैरिफ लागू नहीं करता; यह अमेरिकी राष्ट्रपति को ऐसा टैरिफ लगाने की शक्ति देता है। भारत और चीन मौजूदा आयात के आधार पर इस व्यवस्था के प्रमुख प्रभावित देशों में हैं।

भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा सबसे अहम मुद्दा

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। ऐसे में रूस से अचानक खरीद रोकने पर वैकल्पिक स्रोतों से पर्याप्त मात्रा में तेल मिलना और उसकी कीमत महत्वपूर्ण हो जाती है। हाल के महीनों में भारत ने रूस के अलावा मध्य-पूर्व समेत दूसरे स्रोतों से भी खरीद बढ़ाई है। Reuters के अनुसार, अगस्त 2026 में भारत का रूसी तेल आयात करीब 16.5% घटकर 2.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा, जबकि रूस फिर भी भारत का सबसे बड़ा सप्लायर बना रहा। सितंबर में आयात और घटने का शुरुआती अनुमान है।

रिफाइनरियों की क्षमता भी बड़ी वजह

सीतारमण के मुताबिक, भारत की रिफाइनरियां अलग-अलग ग्रेड के कच्चे तेल को प्रोसेस करने की तकनीकी क्षमता के हिसाब से डिजाइन की गई हैं। इसलिए किसी एक सप्लायर से अचानक दूसरे सप्लायर पर पूरी तरह शिफ्ट करना सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल उपलब्ध होने का सवाल नहीं है। तेल की मात्रा, कीमत, गुणवत्ता और रिफाइनरी की क्षमता—सभी पहलुओं को ध्यान में रखना पड़ता है।

जेलेंस्की ने भारत से रूसी तेल छोड़ने की अपील की

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भारत, चीन और तुर्की से रूस के साथ ऊर्जा कारोबार कम या बंद करने की अपील की है। Wall Street Journal को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि रूस की अर्थव्यवस्था इन देशों के साथ ऊर्जा व्यापार पर काफी निर्भर है और अगर ये देश खरीद बंद करते हैं तो रूस पर युद्ध जारी रखने का आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। यह जेलेंस्की का आकलन है।

इससे पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी कह चुके हैं कि रूस से तेल खरीदना बंद करने या जारी रखने से अकेले रूस-यूक्रेन युद्ध का समाधान नहीं होगा और भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को भी ध्यान में रखना होगा।

100% टैरिफ का भारत पर क्या असर पड़ सकता है?

अगर अमेरिका वास्तव में भारत पर अधिकतम 100% टैरिफ लागू करता है, तो इसका असर भारत-अमेरिका व्यापार पर पड़ सकता है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि एक तरफ रूसी तेल से जुड़ी संभावित अमेरिकी कार्रवाई से निपटना है और दूसरी तरफ घरेलू ऊर्जा जरूरतों के लिए पर्याप्त और प्रतिस्पर्धी कीमत वाला कच्चा तेल सुनिश्चित करना है।

हालांकि, 100% टैरिफ अभी भारत पर स्वतः लागू नहीं हुआ है। नए अमेरिकी कानून ने राष्ट्रपति को इसे लागू करने का अधिकार दिया है; वास्तविक दर और किन देशों पर कार्रवाई होगी, यह अमेरिकी प्रशासन के अगले फैसलों पर निर्भर करेगा।

रूस से तेल खरीद में पहले ही बदलाव शुरू

ताजा आंकड़े बताते हैं कि भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद में कमी की है और अन्य स्रोतों से आयात बढ़ाया है। Reuters के अनुसार, अगस्त में रूस से आयात घटने के साथ इराक और अन्य मध्य-पूर्वी स्रोतों से खरीद में बदलाव देखा गया। इसका मतलब है कि भारत पूरी तरह एक ही स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय अपनी क्रूड खरीद को अलग-अलग स्रोतों में बांट रहा है।

यानी फिलहाल भारत का रुख रूसी तेल की खरीद को अचानक बंद करने के बजाय ऊर्जा स्रोतों में विविधता बनाए रखने और कीमत, उपलब्धता तथा घरेलू जरूरतों के आधार पर तेल खरीदने का है।

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