Home India ‘दिमागी नक्सल’ पर गृह मंत्रालय बेखबर!

‘दिमागी नक्सल’ पर गृह मंत्रालय बेखबर!

नई दिल्ली। राजवीर दीक्षित 

 

(Home Ministry oblivious to ‘intellectual Naxalism’!) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर राजनीतिक विवाद के बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय के RTI जवाब ने बहस को फिर हवा दे दी है। मंत्रालय के संबंधित जन सूचना अधिकारी (CPIO) ने कहा है कि मांगी गई जानकारी उनके पास उपलब्ध नहीं है।

हालांकि, इस जवाब का मतलब यह नहीं है कि पूरे केंद्र सरकार के पास ऐसी कोई जानकारी या वर्गीकरण मौजूद नहीं है। जवाब केवल संबंधित अधिकारी के पास सूचना उपलब्ध न होने की बात कहता है।

RTI में मांगी थी परिभाषा और आंकड़े

द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, 29 अगस्त 2026 को दाखिल RTI में पूछा गया था कि क्या ‘दिमागी नक्सल’ सरकार की कोई आधिकारिक श्रेणी है। यदि ऐसा है, तो लोगों की पहचान किन मानकों के आधार पर की जाती है?

आवेदक ने इस श्रेणी में दर्ज लोगों की कुल संख्या, राज्यवार आंकड़े, संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, कानूनी परिभाषा और पहचान के लिए तय मानदंडों की जानकारी भी मांगी थी।

इसके अलावा, पिछले पांच वर्षों में ऐसे लोगों के खिलाफ दर्ज FIR, गिरफ्तारियों, आरोपपत्रों, दोषसिद्धि और बरी होने के मामलों के आंकड़े भी मांगे गए थे।

30 सितंबर को मिला जवाब

गृह मंत्रालय के वामपंथी उग्रवाद प्रभाग के CPIO ने 30 सितंबर को दिए जवाब में कहा कि मांगी गई जानकारी उनके पास उपलब्ध नहीं है। साथ ही, सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 19(1) के तहत 30 दिनों के भीतर प्रथम अपील करने का विकल्प बताया गया।

28 अक्टूबर को इसी विषय पर दाखिल एक अन्य RTI के जवाब में भी ‘NIL’ दर्ज होने की बात रिपोर्ट में कही गई है।

15 अगस्त के बयान से शुरू हुआ विवाद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त के संबोधन में कहा था कि सशस्त्र नक्सलवाद कमजोर पड़ रहा है, लेकिन नक्सली सोच रखने वाले लोगों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने की जरूरत है। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया था।

इसके बाद विपक्षी नेताओं ने इस शब्द के अर्थ और दायरे पर सवाल उठाए। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने कहा था कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व होगा।

वहीं, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया था कि यह शब्द विपक्षी नेताओं के लिए नहीं, बल्कि माओवादियों का समर्थन करने, संविधान को अस्वीकार करने या अलगाववादी उद्देश्यों का समर्थन करने वालों के संदर्भ में इस्तेमाल किया गया था।

अब भी अनुत्तरित है सबसे बड़ा सवाल

RTI जवाब में न तो ‘दिमागी नक्सल’ की कोई आधिकारिक परिभाषा दी गई और न ही ऐसे लोगों की संख्या या पहचान के मानदंड बताए गए। लेकिन इससे यह भी साबित नहीं होता कि सरकार के किसी अन्य विभाग या रिकॉर्ड में ऐसी जानकारी मौजूद नहीं है।

अब सवाल यह है कि यदि इस शब्द के तहत किसी की पहचान की जाती है, तो उसका आधिकारिक आधार और मानदंड क्या हैं? फिलहाल उपलब्ध जवाब इस सवाल का स्पष्ट उत्तर नहीं देता।

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