द टारगेट न्यूज़:
पंजाब के किसानों के लिए पारंपरिक खेती से हटकर फसल विविधीकरण के तहत लीलियम की खेती एक लाभकारी और उच्च आय वाला विकल्प बनकर उभर रही है। अपनी खुशबू और सुंदर स्वरूप के लिए पहचानी जाने वाली यह हाई-वैभव वाली फूलों की फसल किसानों के मुनाफे को बढ़ाने में मददगार साबित हो रही है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के फ्लोरीकल्चर एंड लैंडस्केपिंग विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, घरेलू और निर्यात बाजारों में इस सजावटी फूल की भारी मांग है, जिससे प्रगतिशील किसानों के लिए यह एक आकर्षक व्यवसाय बन गया है। PAU के वैज्ञानिकों डॉ. रंजीत सिंह और डॉ. तन्या ठाकुर ने बताया कि पंजाब की जलवायु परिस्थितियों में एलए (LA) हाइब्रिड समूहों का प्रदर्शन सबसे बेहतरीन रहा है। ये किस्में अपने विस्तृत रंगों, आकर्षक फूलों और मनमोहक खुशबू के कारण जानी जाती हैं। पंजाब की उप-उष्णकटिबंधीय जलवायु में इस फसल का सबसे अच्छा उत्पादन प्राकृतिक रूप से हवादार पॉलीहाउस के भीतर होता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस फसल के लिए मिट्टी का पीएच मान एशियाई और लोंगीफ्लोरम हाइब्रिड के लिए 6.0 से 7.0 के बीच होना चाहिए, जबकि ओरिएंटल हाइब्रिड के लिए मिट्टी थोड़ी अम्लीय होनी चाहिए। लीलियम की व्यावसायिक खेती मुख्य रूप से कंद (बल्ब्स) के माध्यम से की जाती है। वैज्ञानिक एशियाई हाइब्रिड के लिए 12-14 सेमी और ओरिएंटल हाइब्रिड के लिए 20-22 सेमी परिधि वाले कंदों की सिफारिश करते हैं। इसकी बुवाई का आदर्श समय मध्य सितंबर से मध्य दिसंबर के बीच होता है। कट फ्लावर (कटे हुए फूल) के उत्पादन के लिए 20 सेमी गुणा 15 सेमी की दूरी उपयुक्त मानी जाती है, जबकि कंद उत्पादन के लिए 20 सेमी गुणा 20 सेमी की दूरी पर पौधे लगाए जाने चाहिए। बेहतर पैदावार और उत्कृष्ट गुणवत्ता के लिए ड्रिप सिंचाई और फर्टिगेशन तकनीक का उपयोग करने की सलाह दी जाती है, जिससे पौधों को पोषक तत्व सही मात्रा में मिलते हैं। चूंकि लीलियम के पौधे बल्ब रॉट, स्केल रॉट, फुट रॉट और रूट रॉट जैसी बीमारियों के प्रति संवेदनशील होते हैं, इसलिए कंदों का फंगनाशक उपचार, मिट्टी की ड्रेंचिंग, उचित जल निकासी और खेतों में साफ-सफाई जैसे रोग प्रबंधन के उपाय बेहद जरूरी हैं। भारी फूलों के स्पाइक के कारण पौधों को बांस की डंडियों, नायलॉन के सहारे या प्लास्टिक के जालों से बांधना आवश्यक है ताकि वे गिरें नहीं और उनकी गुणवत्ता बनी रहे। फूलों की कटाई कलर बड स्टेज पर की जाती है, जब कलियां पूरी तरह विकसित हो जाती हैं लेकिन खुली नहीं होतीं। कटाई के बाद उचित रख-रखाव और कम तापमान पर भंडारण करने से फूलों की ताजगी दो सप्ताह तक बनी रहती है, जिससे यह लंबी दूरी के बाजारों के लिए उपयुक्त हो जाते हैं। फूल काटने के छह से आठ सप्ताह बाद कंद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं, जिन्हें आकार के अनुसार छांटा जाता है। अगले सत्र तक इनकी जीवनक्षमता बनाए रखने के लिए उपचारित कंदों को कोकोपिट में 2 से 4 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखा जाता है।