द टारगेट न्यूज़:
चंडीगढ़ के सारंगपुर स्थित बॉटनिकल गार्डन में वन और वन्यजीव विभाग द्वारा एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य शहर में बढ़ते मानव-बंदर संघर्ष का समाधान खोजना था। इस कार्यक्रम में वन्यजीव विशेषज्ञों, सरकारी विभागों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य हितधारकों ने हिस्सा लिया ताकि इस समस्या के वैज्ञानिक, मानवीय और दीर्घकालिक समाधान तलाशे जा सकें। इस उच्चस्तरीय चर्चा का नेतृत्व वरिष्ठ वन अधिकारियों, जैसे मुख्य वन्यजीव वार्डन एवं वन संरक्षक अनूप कुमार सोनी और उप वन संरक्षक सत्येंद्र मौर्य ने किया। विभाग ने इस बात पर जोर दिया कि शहरी बंदर प्रबंधन के लिए केवल प्रतिक्रियावादी बचाव कार्यों से हटकर सक्रिय और विज्ञान-आधारित आवास प्रबंधन की ओर रुख करने की आवश्यकता है। आरक्षित वन क्षेत्रों के भीतर पेड़ों की छतरी की कनेक्टिविटी में सुधार करना और प्राकृतिक रूप से फलों की उपलब्धता बढ़ाना जारी उपायों में शामिल है। विषय विशेषज्ञ डॉ. संदीप शर्मा ने बंदरों के व्यवहार, पारिस्थितिकीय अनुकूलन और वैज्ञानिक प्रबंधन उपायों पर एक तकनीकी सत्र को संबोधित किया। अपने मैदानी अनुभव के आधार पर उन्होंने नसबंदी, कचरे के प्रबंधन, सुरक्षित रूप से संभालने की तकनीकों, विशेष पिंजड़ों और परिचालन की तैयारियों पर चर्चा की। उन्होंने उन अंतर्निहित कारकों को खत्म करने की आवश्यकता पर जोर दिया जो बार-बार बंदरों को मानव बस्तियों की ओर आकर्षित करते हैं। कार्यशाला के दौरान हुए संवादात्मक सत्र में प्रतिभागियों ने सेक्टर 22 और 27, पीजीआईएमईआर, पंजाब यूनिवर्सिटी और सेक्टर 26 के बाजार क्षेत्र में बंदरों के आतंक से जुड़ी लगातार सामने आने वाली चिंताओं को उठाया। इस चर्चा में इन चिन्हित हॉटस्पॉट पर लक्षित हस्तक्षेप, बेहतर ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और जनता द्वारा जानबूझकर खाना खिलाए जाने से रोकने की आवश्यकता पर बल दिया गया। इस कार्यशाला का मुख्य निष्कर्ष यह रहा कि जब तक संघर्ष के मूल कारणों का समाधान नहीं किया जाता, तब तक केवल बंदरों को पकड़ना, उनका स्थानांतरण करना या नसबंदी करना स्थायी राहत प्रदान नहीं कर सकता। शहर में वन्यजीवों के साथ टिकाऊ सह-अस्तित्व की दिशा में सामूहिक प्रयासों को मजबूत करने के लिए नगर निगम, विभिन्न विभागों, एनजीओ और इको-क्लब के प्रतिनिधियों ने इस कार्यक्रम में भाग लिया।


















