द टारगेट न्यूज़:
हाल ही में ‘जामा न्यूरोलॉजी’ (JAMA Neurology) पत्रिका में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों में होने वाली मिर्गी के प्रति वैश्विक दृष्टिकोण को स्पष्ट किया है। इस शोध का नेतृत्व मोहाली स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (NIPER) की प्रोफेसर दीपिका बंसल और चंडीगढ़ के पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) के प्रोफेसर जितेंद्र कुमार साहू ने किया है। इस शोध कार्य को पूरा करने में पीएचडी स्कॉलर मोहम्मद सफीर वीएस और आकांक्षा सिंह ने मुख्य भूमिका निभाई है। यह अध्ययन पिछले पांच दशकों के वैश्विक शोध और दुनिया भर के विशेषज्ञों के अनुभवों का एक व्यापक संकलन है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इन्फैंटाइल एपिलेप्टिक स्पास्म सिंड्रोम (Infantile epileptic spasms syndrome) बच्चों में मिर्गी का एक गंभीर रूप है, जिसका समय पर उपचार न होने से उनके विकास पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। अध्ययन में इस बात पर जोर दिया गया है कि शुरुआती पहचान और त्वरित चिकित्सा हस्तक्षेप बच्चों के स्वास्थ्य और विकास के परिणामों को बेहतर बनाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना, ईईजी (EEG) जैसे आवश्यक परीक्षणों तक पहुंच बढ़ाना और विशेष चिकित्सा देखभाल की उपलब्धता सुनिश्चित करना इस दिशा में सबसे प्रभावी कदम हो सकते हैं। प्रोफेसर दीपिका बंसल ने बताया कि ये वैश्विक अनुमान सरकारों और स्वास्थ्य प्रणालियों को बेहतर सेवाएं तैयार करने में मदद करेंगे। वहीं, प्रोफेसर जितेंद्र कुमार साहू ने अभिभावकों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं द्वारा शुरुआती लक्षणों को पहचानने की आवश्यकता पर बल दिया है, ताकि पीड़ित बच्चों को समय रहते विशेषज्ञ उपचार मिल सके।