ऊना।राजवीर दीक्षित
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में किसानों ने खेती का पारंपरिक तरीका बदलते हुए कम लागत में दूसरी फसल उगाने की नई राह खोजी है। अब धान की कटाई के तुरंत बाद खेत खाली छोड़ने के बजाय किसान बिना जुताई किए आलू की खेती कर रहे हैं। खास बात यह है कि इस तकनीक में खेत की बची हुई नमी का इस्तेमाल किया जाता है और आलू को ढकने के लिए मिट्टी के बजाय धान के अवशेष यानी पराली का उपयोग किया जाता है।
कृषि अनुसंधान उपकेंद्र अखरोट की ओर से इस तकनीक को किसानों के खेतों तक पहुंचाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसी पहल के तहत नंदपुर गांव की रंजना देवी के खेत में जीरो टिलेज तकनीक से आलू की सफलतापूर्वक बिजाई की गई है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि धान की कटाई के बाद खेत की दोबारा जुताई करने की जरूरत नहीं पड़ती। मिट्टी में पहले से मौजूद नमी का इस्तेमाल करके आलू लगाए जाते हैं। इसके बाद धान की बची हुई पराली को मल्च के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है।
इससे न केवल जुताई और सिंचाई पर होने वाला खर्च कम होता है, बल्कि कृषि अवशेषों का भी बेहतर इस्तेमाल हो पाता है।
रंजना देवी ने बताया कि उन्होंने कृषि अनुसंधान उपकेंद्र अखरोट से जीरो टिलेज आलू की खेती का प्रशिक्षण लिया था। तकनीक को बेहतर तरीके से समझने के लिए उन्होंने अनुसंधान केंद्र के खेतों का भी दौरा किया। इसके बाद इस वर्ष उन्होंने अपने खेत में इसका प्रयोग किया।
अब वह दूसरे किसानों को भी इस तकनीक को अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं, ताकि कम लागत वाली खेती का फायदा अधिक से अधिक किसानों तक पहुंच सके।
इस तकनीक से धान की कटाई और अगली फसल की बिजाई के बीच खेत खाली रखने की जरूरत नहीं होगी। साथ ही जुताई और सिंचाई का खर्च घटेगा। पराली को खेत में ही मल्च के रूप में इस्तेमाल करने से उसे जलाने या ठिकाने लगाने की समस्या से भी राहत मिल सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कृषि अवशेषों का इस तरह इस्तेमाल मिट्टी की संरचना और सेहत को बेहतर बनाने में भी मददगार हो सकता है।
कृषि अनुसंधान उपकेंद्र अखरोट इस तकनीक का खेतों में प्रदर्शन कर किसानों को कम लागत, पानी की बचत और जलवायु के अनुकूल खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।
यदि इस प्रयोग के परिणाम सकारात्मक रहते हैं तो धान के बाद आलू की खेती ऊना के किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का प्रभावी विकल्प बन सकती है। इससे सीमित संसाधनों में भी किसान एक ही खेत से दूसरी फसल लेकर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकेंगे।


















