लाहौल-स्पीति । राजवीर दीक्षित
(A global message echoes through the valleys of Himachal! 1,000 people from 6 countries set out on an eco-walkathon)लाहौल-स्पीति की खूबसूरत गार्शा घाटी में रविवार से पर्यावरण संरक्षण की एक अनोखी मुहिम शुरू हुई। दारचा से शुरू हुई ‘गार्शा इको पद यात्रा’ में भारत सहित 6 देशों के 1,000 से ज्यादा प्रतिभागी शामिल हुए हैं। सात दिनों तक चलने वाली इस यात्रा में हर दिन 15 से 18 किलोमीटर का पैदल सफर तय किया जाएगा।
यात्रा के जरिए क्लाइमेट एक्शन, हिमालयी पर्यावरण और सदियों पुरानी बौद्ध विरासत के संरक्षण का संदेश दिया जा रहा है। ऊंचे पहाड़ों और कठिन रास्तों के बीच यह यात्रा लोगों को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का एहसास भी कराएगी।
शांति और आध्यात्मिकता का संदेश लेकर यह यात्रा आगे बढ़ रही है। महामहिम ग्यालवा दोखम्पा रिम्पोचे के नेतृत्व में निकल रही इस यात्रा में महामहिम ड्रुपोन खमटक रिम्पोचे और महामहिम सोमांग रिम्पोचे भी शामिल हैं। ड्रुकपा बौद्ध परंपरा पर आधारित यह यात्रा लोगों को करुणा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक एकजुटता का संदेश दे रही है। साथ ही, लुप्त होती सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में भी जागरूकता पैदा की जा रही है।
डार्चा गोम्पा से पदयात्रा का आगाज, अनुराधा राणा ने दिखाई हरी झंडी
डार्चा गोम्पा में आयोजित उद्घाटन समारोह के दौरान पदयात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। कार्यक्रम में बौद्ध गुरु, आयोजक और बड़ी संख्या में प्रतिभागी मौजूद रहे। लाहौल-स्पीति की विधायक एवं ट्राइबल कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष अनुराधा राणा ने यात्रा का शुभारंभ किया। उन्होंने प्रतिभागियों का उत्साह बढ़ाते हुए उन्हें शुभकामनाएं दीं। समारोह के दौरान पारंपरिक और आध्यात्मिक माहौल देखने को मिला। आयोजकों ने कहा कि यह पदयात्रा क्षेत्र की संस्कृति और धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
YDA की पदयात्रा के लिए राणा ने घोषित किए 1 लाख रुपये
YDA ट्रैवल कमिटी द्वारा आयोजित पदयात्रा के लिए राणा ने अपने विवेकाधीन फंड से 1 लाख रुपये की सहायता राशि देने की घोषणा की। पदयात्रा में लाहौल-स्पीति के पूर्व विधायक एवं वरिष्ठ BJP नेता रवि ठाकुर ने भी भाग लिया। आयोजन में उनकी भागीदारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आधुनिक बदलावों के बीच संस्कृति बचाने की कोशिश
गरशा घाटी में बदलते सामाजिक और आर्थिक हालात के बीच अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने की चुनौती सामने आ रही है। आयोजन समिति की पदाधिकारी डेचेन के अनुसार, इस पहल के जरिए क्षेत्र की पर्यावरणीय समस्याओं के साथ-साथ इसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर भी ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया। बौद्ध तीर्थस्थल और ड्रुकपा परंपरा से जुड़े इस क्षेत्र में युवा पीढ़ी का अपनी जड़ों से जुड़ाव बनाए रखना अहम मुद्दा बनता जा रहा है।
ग्लेशियर पिघले तो बढ़ेगी चिंता! पर्यावरण बदलाव पर फोकस
इस पहल के जरिए जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर को भी सामने लाने की कोशिश की जा रही है। घाटी के लोग ग्लेशियरों, नदियों और पहाड़ी इलाकों के बेहद करीब रहते हैं। तापमान में बदलाव, बारिश के पैटर्न में परिवर्तन और पहाड़ों की संवेदनशीलता सीधे उनके जीवन को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि पर्यावरण संरक्षण को इस पहल का अहम हिस्सा बनाया गया है।
108 पेड़ों से लेकर स्वच्छ रास्तों तक… पर्यावरण बचाने के संदेश के साथ निकलेगी पदयात्रा
इस अभियान के तहत प्रतिभागी 108 पेड़ लगाएंगे, रास्तों से कचरा हटाएंगे और लोगों को पर्यावरण संरक्षण व क्लाइमेट एक्शन के प्रति जागरूक करेंगे। 28 सितंबर को यह यात्रा गरशा ड्रुकपा हेरिटेज फेस्टिवल के साथ संपन्न होगी, जहां घाटी की संस्कृति, परंपराओं और ड्रुकपा विरासत का उत्सव मनाया जाएगा। आयोजकों का उद्देश्य प्रकृति संरक्षण को स्थानीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं से जोड़ना है।



















