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हाई कोर्ट ने बदला भुगतान का हिसाब! प्रिंसिपलों को कार्यभार संभालने के दिन से पैसा

शिमला । राजवीर दीक्षित

(The High Court changed the payment system! Principals received their money from the day they took office) हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने प्रवक्ताओं को प्रिंसिपल (स्कूल कैडर) का कार्यभार सौंपने के बावजूद उन्हें उस पद का उच्च वेतनमान देने से इनकार करने की सरकार की कार्रवाई को अवैध और भेदभावपूर्ण करार दिया है। यानी जिम्मेदारी प्रिंसिपल की, लेकिन वेतन का लाभ नहीं—इसी मुद्दे को लेकर दायर याचिकाओं पर अब कोर्ट ने स्पष्ट फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने सुरिंदर सिंह सहित कुल नौ याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं का निपटारा करते हुए उन्हें राहत दी।

कोर्ट ने सरकार को साफ निर्देश दिए हैं कि जिस वास्तविक तारीख से इन याचिकाकर्ताओं ने प्रिंसिपल पद का कार्यभार संभाला था, उसी तारीख से उन्हें उस पद का उच्च वेतनमान दिया जाए। इसके साथ ही उन्हें संबंधित ग्रेड-पे और पूरा एरियर यानी बकाया भुगतान भी करना होगा।

सबसे अहम बात यह है कि कोर्ट ने भुगतान के लिए समयसीमा भी तय कर दी है। सरकार को सभी याचिकाकर्ताओं को 30 नवंबर 2026 तक उच्च वेतनमान, ग्रेड-पे और बकाया राशि का भुगतान अनिवार्य रूप से करना होगा।

हाईकोर्ट ने सरकार की दलील नकारी, कहा- काम ऊंचे पद का तो वेतन भी उसी पद का

सरकार ने कोर्ट में तर्क दिया कि प्रवक्ताओं को केवल प्लेसमेंट के आधार पर अस्थायी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। सरकार का यह भी कहना था कि कर्मचारियों ने बिना किसी अतिरिक्त वित्तीय लाभ के काम करने की सहमति दी थी। लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने साफ कहा कि किसी कर्मचारी से अगर उच्च पद की जिम्मेदारियां और उसी स्तर का काम लिया जा रहा है, तो उसे उस पद के अनुरूप वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता। केवल यह कह देना कि नियुक्ति अस्थायी या प्लेसमेंट आधार पर थी, कर्मचारी के वित्तीय अधिकार खत्म नहीं करता।

प्रिंसिपल पद पर भेदभाव नहीं चलेगा! हाई कोर्ट ने सरकार को लगाई फटकार

हाई कोर्ट ने साफ कर दिया कि एक ही पद के लिए समान स्थिति वाले कर्मचारियों के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता। प्रिंसिपल पद के लिए हेडमास्टर और लेक्चरर दोनों ही 50:50 कोटे के तहत फीडर कैडर का हिस्सा हैं। कोर्ट ने कहा कि जब 2015-18 के दौरान प्लेसमेंट के आधार पर प्रिंसिपल बनाए गए हेडमास्टरों को कार्यभार संभालने की पहली तारीख से ही उच्च वेतनमान और वरिष्ठता के लाभ दिए गए थे, तो समान श्रेणी के दूसरे कर्मचारियों को इन लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता ।कोर्ट ने इसे समानता के संवैधानिक अधिकार से जुड़ा मामला माना और सरकार के भेदभावपूर्ण रवैये पर सवाल उठाया।

प्रिंसिपल की कुर्सी, लेकिन वेतन प्रवक्ता वाला! हाई कोर्ट पहुंचा मामला

प्रवक्ताओं का आरोप था कि वे प्रिंसिपल पद पर पदोन्नति के लिए पूरी तरह पात्र थे। विभाग में पद खाली होने के बावजूद सरकार ने समय पर नियमित डीपीसी नहीं करवाई। इसके बजाय उन्हें मौजूदा कम वेतनमान पर ही प्रिंसिपल का कार्यभार सौंप दिया गया। इतना ही नहीं, आदेश में साफ शर्त रखी गई कि कार्यभार संभालने की अवधि के लिए उन्हें उच्च वेतनमान का लाभ नहीं मिलेगा।

यानी जिम्मेदारी प्रिंसिपल की, लेकिन वेतन प्रवक्ता वाला!

बाद में हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद वर्ष 2025 में डीपीसी बुलाई गई और 8 मई 2025 को इन्हें नियमित प्रिंसिपल नियुक्त किया गया। हालांकि, वित्तीय लाभ केवल नियमित नियुक्ति की तारीख से दिए गए, जबकि पिछली अवधि को महज काल्पनिक लाभ तक सीमित रखा गया। इसी फैसले को चुनौती देते हुए प्रवक्ताओं ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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