शिमला । राजवीर दीक्षित
(Senior in rank, yet trailing a junior in salary! High Court takes a stern stand) हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि एक ही ग्रेड में समान कार्य कर रहे वरिष्ठ अधिकारी का वेतन उसके कनिष्ठ कर्मचारी से कम नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि अगर किसी जूनियर कर्मचारी को संवैधानिक आरक्षण के प्रावधानों के तहत समय से पहले पदोन्नति मिली है, तो भी इससे वरिष्ठ अधिकारी के वेतन पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज ने याचिकाकर्ता दिलबाग राय सेतिया की याचिका स्वीकार करते हुए प्रदेश सरकार को वरिष्ठता सूची दोबारा तैयार करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही वरिष्ठ अधिकारी का वेतन उसके कनिष्ठ कर्मचारियों के बराबर करने का आदेश दिया गया है।फैसले के बाद अब वरिष्ठता और वेतन निर्धारण को लेकर सरकार को अपनी प्रक्रिया में बदलाव करना होगा।
वरिष्ठता में आगे, फिर भी प्रमोशन में पीछे! SC वर्ग के जूनियर कर्मचारियों की पदोन्नति पर उठा विवाद
याचिकाकर्ता की नियुक्ति 7 फरवरी 1973 को सेक्शन ऑफिसर के पद पर हुई थी। बाद में इस पद का नाम बदलकर जूनियर इंजीनियर (सिविल) कर दिया गया। अंतिम वरिष्ठता सूची में याचिकाकर्ता का स्थान 465वां था। खास बात यह रही कि उनके कुछ कनिष्ठ कर्मचारी अक्टूबर 1973 में नियुक्त हुए थे। ये कर्मचारी अनुसूचित जाति वर्ग से थे और आरक्षण नियमों के तहत उन्हें 27 मई 1998 को ही असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर प्रमोशन मिल गया।
यानी नियुक्ति में कनिष्ठ होने के बावजूद आरक्षण व्यवस्था के चलते उन्हें पदोन्नति पहले मिल गई। इसी वरिष्ठता और पदोन्नति के अंतर को लेकर मामला अदालत तक पहुंचा।
जूनियर की सैलरी ज्यादा, सीनियर के साथ हुआ वेतन का भेदभाव?
सामान्य श्रेणी के तहत दिलबाग राय को 5 अप्रैल 2006 को असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर नियमित पदोन्नति मिली। लेकिन पदोन्नति के बाद स्थिति ऐसी बनी कि उनके ही जूनियर कर्मचारियों को उनसे अधिक वेतन मिलने लगा। दिलबाग राय ने वेतन विसंगति दूर करने की मांग की, लेकिन सरकार ने इसे ठीक करने से इनकार कर दिया। मामला आखिरकार हाईकोर्ट तक पहुंचा।
सरकार के तर्क नहीं चले, कोर्ट ने वरिष्ठता पर स्थिति की साफ
कोर्ट ने सरकार की ओर से दिए गए तर्कों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर सामान्य श्रेणी का कोई कर्मचारी आरक्षित श्रेणी के कर्मचारी से वरिष्ठ है, लेकिन पदोन्नति के क्रम में वह पीछे रह जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसकी वरिष्ठता खत्म हो जाएगी।
यदि वह अपने कनिष्ठ कर्मचारी की अगली पदोन्नति से पहले उच्च पद पर पहुंच जाता है, तो वहां भी उसे वरिष्ठ ही माना जाएगा। पदोन्नति मिलते ही उसकी मूल वरिष्ठता बहाल हो जाएगी।
एक ही ग्रेड में तैनात और समान काम करने वाले अधिकारियों के बीच वेतन का अंतर अब अदालत की नजर में आ गया है। हाईकोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ अधिकारी को कनिष्ठ से कम वेतन देना किसी भी स्थिति में मनमाना और भेदभावपूर्ण नहीं होना चाहिए। वित्त विभाग का आरक्षण रोस्टर वाला तर्क भी इस मामले में टिक नहीं पाया।

















