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दलाई लामा के उत्तराधिकार पर अमेरिका की एंट्री! 30 जून को धर्मशाला में होगी निर्णायक चर्चा

धर्मशाला/कांगड़ा । राजवीर दीक्षित

(US steps in regarding the Dalai Lama’s succession! Decisive discussion to be held in Dharamshala on June 30) चीन और अमेरिका के बीच तनाव के बीच तिब्बत को लेकर एक नया कूटनीतिक विवाद सामने आया है। अमेरिकी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में दलाई लामा से मुलाकात की। यह मुलाकात ऐसे समय हुई जब बीजिंग ने पहले ही अमेरिका से दलाई लामा और उनके समूह के लोगों से मिलने से परहेज करने को कहा था। चीन लंबे समय से दलाई लामा को तिब्बत से जुड़े राजनीतिक मुद्दे के संदर्भ में संवेदनशील मानता रहा है। ऐसे में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की यह बैठक बीजिंग को नागवार गुजरी है और इससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ने की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है।

भारत में अमेरिका का प्रतिनिधिमंडल… और निशाने पर चीन!

अमेरिकी सांसदों का सात सदस्यीय द्विदलीय प्रतिनिधिमंडल धर्मशाला पहुंचा और यहां निर्वासित तिब्बती नेतृत्व से मुलाकात के बाद दलाई लामा से भी बातचीत की। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की इस यात्रा ने चीन की चिंता बढ़ा दी। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के तत्कालीन चेयरमैन माइकल मैक्कॉल ने किया, जबकि पूर्व हाउस स्पीकर नैंसी पेलोसी भी इसमें शामिल थीं।

धर्मशाला में अमेरिकी सांसदों ने तिब्बत के मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखी। दलाई लामा से मुलाकात के दौरान तिब्बत के भविष्य, मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दे चर्चा में रहे। खास बात यह रही कि अमेरिकी सांसदों के बयानों में चीन को लेकर कड़ा संदेश दिखाई दिया। यानी धर्मशाला से निकली आवाज सीधे बीजिंग तक पहुंची और चीन को इस दौरे पर आपत्ति जतानी पड़ी।

तिब्बत बना अमेरिका-चीन तनाव का एक और मुद्दा

अमेरिका की तिब्बत नीति लंबे समय से चीन के लिए संवेदनशील विषय रही है। वॉशिंगटन तिब्बती लोगों के धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों का समर्थन करता है और चीन की मानवाधिकार नीतियों की आलोचना करता रहा है।
तिब्बत की भौगोलिक स्थिति भी इसे बेहद महत्वपूर्ण बनाती है, क्योंकि यह क्षेत्र भारत और चीन की सीमा के करीब स्थित है।

तिब्बत पर चीन के दावे को अमेरिका का बड़ा झटका! दलाई लामा से बातचीत के लिए ड्रैगन पर बढ़ाया दबाव

तिब्बत को लेकर अमेरिका ने ऐसा कदम उठाया है, जिसने चीन की मुश्किलें बढ़ाने वाला कूटनीतिक संदेश दिया है। अमेरिकी संसद से पारित ‘Promoting a Resolution to the Tibet-China Dispute Act’ अब कानून बन चुका है। इसके जरिए अमेरिका ने तिब्बत विवाद पर बातचीत और शांतिपूर्ण समाधान की नीति को और मजबूत किया है।

कानून में चीन और दलाई लामा या उनके प्रतिनिधियों के बीच बिना पूर्व शर्त बातचीत की बात कही गई है। साथ ही अमेरिका ने चीन के उस दावे को ऐतिहासिक रूप से गलत बताया है कि तिब्बत हमेशा से चीन का हिस्सा रहा है।

इतना ही नहीं, अमेरिका तिब्बत के इतिहास और वहां के लोगों से जुड़ी चीन की कथित गलत सूचनाओं का मुकाबला करने की दिशा में भी काम करेगा।

अब सवाल यह है कि अमेरिका के इस कदम पर चीन की अगली प्रतिक्रिया क्या होगी? और क्या तिब्बत को लेकर लंबे समय से रुकी बातचीत का रास्ता फिर खुल पाएगा?

ल्हासा से धर्मशाला तक… दलाई लामा के जीवन की कहानी

ल्हासा से धर्मशाला तक का दलाई लामा का सफर सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि इतिहास के एक बड़े राजनीतिक अध्याय से भी जुड़ा है।

6 जुलाई 1935 को जन्मे ल्हामो थोंडुप को दो वर्ष की उम्र में 13वें दलाई लामा का पुनर्जन्म माना गया। वर्ष 1940 में उन्हें 14वें दलाई लामा के रूप में मान्यता दी गई।

1950 में तिब्बत में चीन के प्रवेश के बाद हालात तेजी से बदले। वर्ष 1959 में तिब्बती विद्रोह विफल होने के बाद दलाई लामा भारत आ गए। इसके बाद से धर्मशाला उनका निर्वासन स्थल बना हुआ है।

वर्षों से दलाई लामा दुनिया के अलग-अलग मंचों पर तिब्बती लोगों, अहिंसा, करुणा और शांति की बात करते रहे हैं। उनके इसी वैश्विक शांति संदेश के लिए उन्हें 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

आज धर्मशाला दलाई लामा के कारण दुनिया भर में तिब्बती संस्कृति और निर्वासित तिब्बती समुदाय से जुड़े एक प्रमुख केंद्र के रूप में जाना जाता है।

दलाई लामा से मुलाकात पर चीन क्यों भड़का? अमेरिका-भारत की नजदीकी ने बढ़ाई बीजिंग की बेचैनी!

अमेरिकी सांसदों का भारत दौरा अब सिर्फ एक राजनयिक मुलाकात तक सीमित नहीं रह गया है। धर्मशाला में दलाई लामा से अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात ने चीन की नाराजगी बढ़ा दी है। खास बात यह है कि यह मुलाकात ऐसे समय हुई है, जब वाशिंगटन और बीजिंग अपने रिश्तों में आई तल्खी कम करने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत और चीन के बीच भी रिश्ते पहले से तनावपूर्ण हैं। वर्ष 2020 में सीमा पर हुए सैन्य गतिरोध में भारत के 24 सैनिकों की मौत हुई थी, जिसके बाद दोनों देशों के संबंधों में गंभीर तनाव पैदा हुआ।

हालांकि अमेरिका ने Resolve Tibet Act पारित किया है, लेकिन वाशिंगटन अभी भी तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र को चीन का हिस्सा मानता है। वहीं चीन दलाई लामा पर अलगाववाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाता रहा है। दलाई लामा इन आरोपों को स्वीकार नहीं करते और कहते हैं कि उनकी मांग चीन से अलग होने की नहीं, बल्कि तिब्बत के लिए वास्तविक स्वायत्तता की है।

लेकिन असली विवाद सिर्फ तिब्बत की स्वायत्तता का नहीं है। सबसे बड़ा सवाल दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर है।

चीन का कहना है कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी की नियुक्ति में उसे अधिकार प्राप्त है। दूसरी तरफ दलाई लामा का कहना है कि यह फैसला तिब्बती लोगों का होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा है कि उनका अगला अवतार भारत में मिल सकता है।

अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख और Resolve Tibet Act के लेखकों में शामिल माइकल मैककॉल ने यात्रा से पहले कहा था कि इस दौरे का उद्देश्य तिब्बत को उसके भविष्य में अपनी आवाज रखने के लिए अमेरिकी संसद में मौजूद द्विदलीय समर्थन को सामने लाना है।

दलाई लामा पर अमेरिका-चीन आमने-सामने, बीजिंग ने दी बड़ी चेतावनी

दलाई लामा… तिब्बत… और अमेरिका। इन तीनों के बीच एक बार फिर ऐसा कनेक्शन सामने आया है, जिसने चीन की चिंता बढ़ा दी है।

अमेरिकी सांसदों की दलाई लामा से मुलाकात और तिब्बत से जुड़े विधेयक को लेकर चीन ने कड़ा ऐतराज जताया है। बीजिंग ने अमेरिकी सांसदों से दलाई लामा से दूरी बनाए रखने को कहा था।

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन चियान ने अमेरिका को सीधे तौर पर चेतावनी देते हुए कहा कि वॉशिंगटन को तिब्बत की आजादी का समर्थन नहीं करना चाहिए और व्हाइट हाउस को संबंधित विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं करना चाहिए।

यहीं नहीं रुका चीन का विरोध…
लिन चियान ने कहा कि अगर अमेरिका ने चीन की आपत्तियों को नजरअंदाज किया, तो बीजिंग दृढ़ कदम उठाएगा। हालांकि, इन कदमों की प्रकृति के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई।

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